18 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
चौथी बैठक - 9 दिसंबर 1930
डॉ. अम्बेडकरऽः इस समय मैं इन दो समुदायों को ले रहा हूं, क्योंकि ये महत्वपूर्ण समुदाय हैं। मुझे ऐसा प्रतीत होता है कि इस तथ्य पर आधारित तर्क से हम ऐसे निष्कर्ष पर पहुंचेंगे कि हम कानून और व्यवस्था का अंतरण कभी नहीं कर पाएंगे। अतः इस तर्क को स्वीकृत नहीं किया जाना चाहिए। मुझे यह भी लगता है कि नोबल मारक्वेस की धारणा है कि यदि कोई मुसलमान अथवा हिंदू कानून और व्यवस्था का प्रभारी बनता है, तो वह उसी समुदाय विशेष की सनक से प्रभावित होकर कार्य करेगा, जिस समुदाय का वह होगा। महोदय! मेरा निवेदन है कि इससे यह धारणा बनती है कि भविष्य में भारत में राजनीतिक दलों का गठन राजनीतिक अथवा आर्थिक विचारधारा के आधार पर नहीं, बल्कि धार्मिक आधार पर होगा। किंतु मेरे विचार से स्थिति को देखते हुए ऐसा प्रतीत होता है कि भारत के भावी संविधान में कार्यपालिका का गठन ऐसा होगा कि धार्मिक और जातिगत भेदभाव कम उभरेंगे और एक हिंदू मंत्री के दल और अनुयायियों में काफी संख्या में मुसलमान होंगे और मुसलमान मंत्री के समूह और अनुयायियों में हिंदू होंगे। यदि ऐसा होता है, और मैं निश्चयपूर्वक कह सकता हूं कि ऐसा होगा, तब यह समझना कठिन है कि उदाहरण के तौर पर कानून और व्यवस्था का प्रभारी मंत्री कानून और व्यवस्था को लागू करने में उस समूह के एक हिस्से की भावनाओं का आदर क्यों नहीं करेगा, जिसका उसे समर्थन प्राप्त है। इसलिए इस तरह की आशंकाएं बेबुनियाद और निराधार हैं।
दूसरी जिस बात पर न्यूनाधिक रूप से सहमति हो गई है, वह यह है कि कार्यपालिका को न केवल एकीकृत होना चाहिए, बल्कि उसका अलग नहीं, सामूहिक उत्तरदायित्व होना चाहिए। महोदय! बहस के दौरान जिन बातों पर मुख्यतया मतभेद सामने आए हैं, वे कार्यपालिका की रचना के प्रश्न को लेकर हैं। पहला प्रश्न यह है कि क्या कार्यपालिका में विधान-मंडल के सदस्यों को ही लिया जाए अथवा इसमें विधान-मंडल के बाहर से शासकीय अथवा गैर-शासकीय व्यक्तियों को भी शामिल किया जाए? दूसरा प्रश्न है कि क्या इसमें अल्पसंख्यक वर्गों के सदस्यों को भी शामिल किया जाए? तीसरा प्रश्न है कि क्या इन मंत्रियों की नियुक्ति का उत्तरदायित्व गवर्नर का हो अथवा क्या उसे केवल मुख्यमंत्री की नियुक्ति का उत्तरदायित्व प्रदान किया जाए और उसके सहयोगियों की नियुक्ति का उत्तरदायित्व मुख्यमंत्री का हो।
महोदय, मैं इन तीनों प्रश्नों का उत्तर ‘हां’ में देना चाहता हूं। मेरे विचार से मंत्रिमंडल की सदस्यता विधान-मंडल के सदस्यों तक सीमित नहीं रखी जानी चाहिए। कार्यपालिका में यथासंभव उन सभी समुदायों के प्रतिनिधि शामिल किए जाएं, जिन्हें विधान-मंडल में प्रतिनिधित्व प्राप्त है अथवा नहीं और इस संबंध में उचित प्रावधान किया जाए। दूसरा
ऽ प्रोसीडिंग्स ऑफ दि सब-कमेटी नं. 2 (प्रोविंसियल कांस्टीट्यूशन), पृ. 95-102