336 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
डॉ. भीमराव अम्बेडकरः किन्तु फिर भी मुद्दा दोनों स्थितियों में एक ही होगा, अर्थात् संविधान अधिनियम का निर्वचन। यदि अंतर भिन्न वादहेतुक पर आधारित हो तो मैं उसे भली-भांति समझ सकता हूं, लेकिन जहां वादहेतुक वही है, अर्थात् अभिवाव्Q वही है, यानि संविधान भंग किया गया है, वहां मुझे इकाइयों और पक्षकारों के आधार पर अंतर करने में कोई औचित्य दिखाई नहीं पड़ता।
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14,380. डॉ. भीमराव अम्बेडकरऽः अब एक और सवाल है, जो कि भारत मंत्री से पूछना चाहता हूं और वह यह है, मुझे इसके बारे में श्वेत-पत्र में कोई भी उपबंध दिखाई नहीं पड़ता। क्या भारत मंत्री महोदय! आप यह वांछनीय समझते हैं कि ऐसा उपबंध किया जाना चाहिए, जो गैर-सरकारी व्यक्तियों को इस घोषणा के लिए मुकदमा चलाने की इजाजत दे कि अमुक अधिनियम असंवैधानिक है, भले ही वह किसी विनिर्दिष्ट प्रयोजन की मांग न करे। मेरा अभिप्राय है कि सब मामले जिनके लिए आपने उपबंध किया है मुझे ऐसे मामले दिखाई पड़ते हैं, जिनमें किसी विनिर्दिष्ट प्रयोजन की मांग की जाए। यह वांछनीय हो सकता है कि गैर-सरकारी व्यक्ति अपने भविष्य की रक्षा करने के लिए उसे परखना चाहे, यदि उसे कोई संदेह है, कि संघ द्वारा या किसी प्रांत द्वारा किया गया विशिष्ट प्रस्ताव असंवैधानिक है जिसका कि भविष्य में अपनी स्थिति के लिए विनिर्दिष्ट प्रयोजन मांगने का कोई कारण नहीं है?
माननीय सेम्युअल होरः इस प्रकार के प्रश्न का उत्तर देने में मुझे वकील न होने के कारण कुछ संकोच है। किन्तु यदि मैं एक आम आदमी की भांति अचानक इसका उत्तर दूं, तो मैं यह कहूंगा कि किसी व्यक्ति को प्रभावित करने वाले किसी विनिर्दिष्ट मुद्दे के बिना इस प्रकार का साधारण अधिकार देना अत्यन्त कठिन था।
मारक्वेस ऑफ रीडिंगः क्या मैं यह मत व्यक्त कर सकता हूं कि जो कुछ आपने कहा है, वह वास्तव में कानून है, जो कि इस देश में लागू होता है। इस देश में इस प्रकार के आवेदन पत्रों पर हम, अर्थात् कठिनाई के मामलों को मंजूरी नहीं देते जब तक कोई सार्थक विवाद न हो और ज्यों ही विवाद होगा, ऐसा किया जा सकता है। हम इसको कभी मंजूर नहीं करते, और मैं नहीं समझता, भारत में वे करते हैं।
माननीय हरी सिंह गौड़ः कोई वादहेतुक नहीं, कोई वाद अधिकार नहीं।
श्री जफरुल्ला खांः असल में यदि संविधान में ऐसा उपबंध डाल दिया जाए, तो बहुत अधिक कठिनाइयां हो जाएंगी। अधिनियम के पारित होते ही भारत में लाखों मुकदमें दाखिल होने लगेंगे।
14,381. डॉ. भीमराव अम्बेडकरः मैं नहीं समझता कि हर कोई अपने अधिकार का प्रयोग करेगा?
ऽ मिनिट्स ऑफ एविडेंस, खंड 2-ख, 7 नवंबर 1933, पृ. 1344