22 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
प्रश्न का संबंध है, चाहे वह प्रावधान बड़ा हितकारी है, फिर भी मैं चाहता हूं कि किसी समुदाय विशेष के हितों पर विपरीत प्रभाव डालने वाले मामलों के संबंध में कानूनी प्रावधान किए जाएं_ इसे गवर्नर की स्वेच्छा पर नहीं छोड़ा जाना चाहिए। गवर्नर को मंत्रिमंडल से संपर्क बनाए रखना होता है और मंत्रिमंडल को विधान-मंडल के बहुमत का समर्थन मिला होता है। वह मंत्रिमंडल के प्रतिकूल कार्य नहीं कर सकता, उनमें मधुर संबंध होने चाहिएं। मेरे विचार से गवर्नर अल्पसंख्यकों के संरक्षण के लिए सदन में बहुमत का प्रतिनिधित्व करने वाले मंत्रिमंडल के साथ हमेशा लड़ता नहीं रहेगा। मैं चाहता हूं कि अल्पसंख्यकों के हितों का संरक्षण अपेक्षाकृत अधिक पक्के ढंग से किया जाए और इस खंड का लोप किया जाए।
मैं 3, 4 और 5 मदों के संबंध में इस बात से सहमत हूं कि गवर्नर को ऐसे मामलों में अभिभावी शक्तियां दी जानी चाहिएं, क्योंकि ये ऐसे मामले हैं जहां प्रशासन के लिए वह निजी तौर पर उत्तरदायी होता है।
अगला विषय गवर्नर और विधान-मंडल की शक्तियों के बारे में है। मैं अपने विचार तीन शीर्षकों के अंतर्गत रखूंगा। पहला, बजटीय विधान, दूसरा, सामान्य विधान और तीसरा, आपात विधान। गवर्नर को इस समय सुरक्षित विषयों के लिए प्रावधान करने के संबंध में प्रमाण-पत्र देने की शक्तियां प्राप्त हैं। प्रांत में सुरक्षा और शांति बनाए रखने के लिए व्यय प्राधिकृत करने का भी उसे प्राधिकार प्राप्त है। यदि सुरक्षा और शांति के प्रश्नों के समाधान की जिम्मेदारी उत्तरदायी सरकार को दी जानी है, तो गवर्नर को इसके लिए व्यय का प्राधिकार नहीं दिया जाना चाहिए। इसके अतिरिक्त, उसे विधेयकों के संबंध में प्रमाण-पत्र देने की शक्ति प्राप्त है। यह दो प्रकार की है। यह प्रमाणित कर सकता है कि विधान-मंडल में चर्चाधीन विधेयक पर आगे चर्चा न की जाए, क्योंकि उससे प्रांत की सुरक्षा और शांति भंग हो सकती है और उसे यह भी प्रमाणित करने का अधिकार है कि अमुक विधेयक प्रांत की सुरक्षा और शांति के हित में है, चाहे विधान-मंडल की उसे सामान्य रूप में पारित करने की इच्छा न हो। मेरे विचार से इन दोनों शक्तियों को रद्द कर दिया जाना चाहिए। भारत के भावी संविधान में इन शक्तियों का प्रावधान करने की कोई आवश्यकता नहीं है।
उसे पूर्वानुमति का अधिकार भी है। कतिपय विषयों पर चर्चा के लिए पूर्वानुमति लेनी पड़ती है और मेरे विचार से यह अधिकार भी समाप्त कर दिया जाए।
माननीय अहमद सईद खांः भेदभाव संबंधी विधान?
डॉ. अम्बेडकरः उसे भी गवर्नर पर न छोड़कर उसका सांविधिक प्रावधान किया जाए। गवर्नर को निषेधाधिकार करने का अधिकार प्राप्त होना चाहिए। जो प्रांत चाहें, वहां द्वितीय सदन नहीं बनाया जाएगा, ऐसे प्रांतों में गवर्नर को निषेधाधिकार दिया जाना