3. उप-समिति संख्या 2 (प्रांतीय संविधान) - Page 42

उप-समिति संख्या 2

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बैठक में की गई सिफारिशों से गवर्नर को अवगत कराना अनिवार्य हो। इस विषय में मैं बस यही कहना चाहता हूं।

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डॉ. अम्बेडकरऽः मुझे यह कहना है कि द्वितीय सदन की स्थापना पहले नहीं की जानी चाहिए और तत्पश्चात् अपेक्षित बहुमत से संवैधानिक संकल्प पारित कर उसका समापन किया जा सकता है। हम यह सुझाव देना चाहते हैं कि यदि कुछ प्रांतों में इस विषय को स्वविवेक पर छोड़ दिया जाता है, तो द्वितीय सदन की स्थापना के लिए प्रांतीय विधान-मंडल में इस आशय का संकल्प पारित किया जाए कि वे द्वितीय सदन की स्थापना करना चाहते हैं, तभी द्वितीय सदन की स्थापना की जाए। इसे किसी प्रांतीय विधान-मंडल पर संवैधानिक रूप से थोपा नहीं जाना चाहिए।

पांचवी बैठक - 15 दिसंबर, 1930

डॉ. अम्बेडकर [] ः महोदय, नोबल मारक्विस द्वारा प्रस्तुत संशोधन पर मैं एक या दो टिप्पणियां करना चाहता हूं। मैं आरंभ में ही यह कह देना चाहता हूं कि उन्होंने उसमें बड़ी तर्कसंगत बात कही है। इस प्रतिवेदन में हम यह व्यवस्था कर रहे हैं कि विधान परिषद में कुछ हितों और अल्पसंख्यकों को नामांकन द्वारा प्रतिनिधित्व प्रदान किया जाए। इसके साथ इस प्रतिवेदन में हम यह भी व्यवस्था कर रहे हैं कि गवर्नर का यह दायित्व होगा कि वह अपने मंत्रिमंडल में सभी वर्गों और सभी अल्पसंख्यक वर्गों को प्रतिनिधित्व दिलाने का प्रयास करे। महोदय! जब तक आप इस मंत्रिमंडल में इसकी व्यवस्था नहीं करते हैं, गवर्नर को भी नामांकन द्वारा कुछ विशेष हितों का प्रतिनिधित्व करने वाले सदस्यों को शामिल करने का अधिकार होगा, मेरे विचार से यह एक अत्यंत असंगत स्थिति होगी। इस प्रतिवेदन में या तो यह व्यवस्था की जाए कि विधान परिषद के लिए कोई नामांकन नहीं किया जाएगा और सभी वर्गों को चुनाव द्वारा अवसर दिया जाएगा अथवा यदि नामांकन की व्यवस्था की जाती है, तो नामांकित सदस्य को, यदि उसके साथी सामूहिक उत्तरदायित्व के सिद्धांत के आधार पर उसके साथ कार्य करने के लिए तैयार हों, मंत्रिमंडल में शामिल होने का अधिकार होना चाहिए।

महोदय! इस ओर बेठे मेरे मित्रों का कहना है कि यदि हम इस सिद्धांत को स्वीकार करते हैं कि एक नामांकित सदस्य मंत्रिमंडल का सदस्य हो सकेगा अथवा उस पर मंत्रिमंडल का सदस्य होने पर प्रतिबंध नहीं, तो यह बात उत्तरदायित्व के सिद्धांत के

ऽ प  वही, पृ. 156-57्रोसीडिंग्स ऑफ दि सब-कमेटी नं. 2 (प्रोविंसियल कांस्टीट्यूशन), पृ. 133