उप-समिति संख्या 2
विधान-मंडल में सहयोजित सदस्यता का विरोध
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डॉ. अम्बेडकरऽः मैं इस संशोधन का विरोध करता हूं। पहली बात यह है कि बंबई में सहयोजित सदस्यता का हमारा अनुभव कोई अधिक उत्साहवर्द्धक नहीं रहा है। सहयोजित सदस्यता एक कलंक बनकर रह गई है। भ्रष्टाचार और घूस के बोलबाले को देखते हुए बंबई के विधान-मंडल के गठन में मैं सहयोजित सदस्यता के सिद्धांत का विरोध करता हूं।
एक आपत्ति यह भी है कि यदि विभिन्न संप्रदाय चुनावों में निर्वाचित नहीं हो पाते, तो संप्रदाय विशेष के प्रभाव से मुक्त वास्तविक प्रतिनिधित्व के लिए सहयोजित सदस्यता के सिद्धांत से कोई लाभ नहीं होगा, क्योंकि संभव है कि सहयोजित सदस्यता के समय केवल उन्हीं को सहयोजित किया जाए, जो बहुसंख्यकों के हाथ का खिलौना बनना चाहें। मेरे विचार से यह स्थिति बिल्कुल भी प्रतिनिधित्व न मिलने से भी बदतर होगी और इस आधार पर मैं इसका विरोध करता हूं। महोदय! मेरा निवेदन है कि इस उप-समिति को यह सिफारिश करनी चाहिए कि प्रांतीय विधान-मंडलों का संविधान ऐसा हो कि उसमें नामांकन का प्रावधान न किया जाए।
दीवान बहादुर रामचंद्र रावः यह बेहतर रहेगा।
डॉ. अम्बेडकरः इस विषय पर यह मेरा विचार है। मैं निश्चय ही सहयोजित सदस्यता का विरोधी हूं।
दीवान बहादुर रामचंद्र रावः मैं सहमत हूं कि इस प्रतिवेदन में कुछ इस तरह की सिफारिश की जाए कि विधान-मंडल के सभी सदस्य निर्वाचित होने चाहिएं और जब तक उप-समिति की ओर से इस तरह का संकेत नहीं दिया जाएगा, नामांकन तत्व हमेशा बना रहेगा, हालांकि हम सब सदस्यों की यही इच्छा है कि नामांकन का चलन समाप्त होना चाहिए। इस संबंध में प्रतिवेदन में सिफारिश की जाए। मुझे इस बारे में कोई संदेह नहीं है कि हम सब नामांकन की बुराइयों से परिचित हैं और हम चाहते हैं कि इसे शीघ्रातिशीघ्र समाप्त किया जाए। इन परिस्थितियों में मैं इस संशोधन का समर्थन नहीं करूंगा और अपने मित्र, डॉ. अम्बेडकर के प्रस्ताव का समर्थन करूंगा।
अध्यक्षः प्रस्ताव क्या था? मेरे समक्ष प्रस्ताव का पाठ नहीं है।
डॉ. अम्बेडकरः हम यह कहेंगे कि उप-समिति की यह राय है कि इसके पश्चात् प्रांतों में विधान परिषदों के सभी सदस्य निर्वाचित हों।
अध्यक्षः यह एकदम भिन्न संशोधन है, यदि आप इसे पेश करना चाहते हैं, तो आपको इसे लिखित रूप में देना होगा।
ऽ प्रोसीडिंग्स ऑफ दि सब-कमेटी नं. 2 (प्रोविंसियल कांस्टीट्यूशन), पृ. 194