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उप-समिति संख्या 3

(अल्पसंख्यक)

दूसरी बैठक - 31 दिसंबर, 1930

डॉ. अम्बेडकरऽः अध्यक्ष महोदय! मुझे विश्वास है कि आप इस बात से सहमत होंगे कि दलित वर्ग की समस्याएं रखने का, जो दायित्व मुझे सौंपा गया है, वह काफी कठिन है। मैं समझता हूं कि यह शायद पहला अवसर है, जब दलितों की समस्याओं पर राजनीतिक दृष्टिकोण से विचार किया जा रहा है। वेसे देश के राजनीतिक उत्थान पर जब-जब बहस छिड़ी है, हर बार दलितों की समस्याओं को रेखांकित किया गया है और सरकारी दस्तावेजों में उन्हें बाकायदा दर्ज किया गया है। लेकिन यह सब कुछ मात्र कागजी कार्यवाही बनकर रह गया। समस्याएं दर्ज कर ली गईं, लेकिन उनका कोई समाधान नहीं खोजा गया। वे ज्यों-की-त्यों बनी रहीं। जो दायित्व हमें सौंपा गया है, वह बड़ा कठिन है। इस समिति में ढेर सारे सदस्य हैं, लेकिन चार करोड़ तीस लाख जनता की समस्याओं को समिति के समक्ष रखने का काम दो लोगों को सौंपा गया है, और समस्याएं ऐसी हैं कि जिनकी देश के अन्य किसी भी समुदाय की समस्याओं से कोई तुलना नहीं हो सकती। इन बातों को दृष्टिगत रखते हुए मैं चाहता था कि दलितों की समस्याओं को रखने के लिए, जो समय मुझे दिया गया है, वह थोड़ा और बढ़ाया जाता। लेकिन पूर्ण अधिवेशन के अनुभवों को देखते हुए मैंने और मेरे सहयोगी राव बहादुर श्रीनिवासन ने तय किया है कि हम सम्मेलन के समक्ष लिखित ज्ञापन [] रखेंगे, जिसमें सुस्पष्ट शब्दों में यह बात दर्ज होगी कि दलित अपनी राजनीतिक सुरक्षा के लिए भारत के भावी संविधान में क्या कुछ चाहते हैं। वह लिखित ज्ञापन इस समिति के सभी सदस्यों के बीच वितरित कर दिया गया है। मुझे आशा है कि वह सबको मिल गया होगा

ऽ प्रोसीडिंग्स ऑफ दि सब-कमेटी नं. 3 (माइनारिटीज), 1931, पृ. 73-80

उप-समिति के विचारार्थ विषय निम्नानुसार थेः

अल्पसंख्यक और विशेष हितों का स्वेच्छा से सहयोग सुनिश्चित करने हेतु प्रावधान।ज्ञापन इस अध्याय के अंत में पृ. 62-71 पर परिशिष्ट I के रूप में दिया गया है।