4. उप-समिति संख्या 3 (अल्पसंख्यक) - Page 48

उप-समिति संख्या 3

31

और सभी सदस्यों ने उसे पढ़ लिया होगा। ऐसी स्थिति में मैं अध्यक्ष महोदय से अधिक समय नहीं लेना चाहूंगा। मैं ज्ञापन का सारांश रखना चाहूंगा, ताकि उसके मुख्य-मुख्य पहलुओं पर प्रकाश पड़ सके।

महोदय! सर्वप्रथम मैं आपका ध्यान इस तथ्य की ओर दिलाना चाहूंगा कि हालांकि भारत में अनेक अल्पसंख्यक वर्ग हैं, जिनकी अपनी राजनीतिक पहचान होनी चाहिए, लेकिन ये सभी अल्पसंख्यक वर्ग एक जैसे नहीं हैं, इनमें अनेक असमानताएं हैं, एक दूसरे से भिन्नताएं हैं। प्रत्येक अल्पसंख्यक वर्ग की सामाजिक हैसियत अलग-अलग है। उदाहरण के लिए भारत का सबसे छोटा अल्पसंख्यक वर्ग है, पारसी समुदाय। इस समुदाय की सामाजिक हैसियत बहुसंख्यकों की सामाजिक हैसियत से कम नहीं है। दूसरी ओर दलित वर्ग है। देश के सबसे बड़े अल्पसंख्यक समुदाय, अर्थात् मुस्लिम समुदाय के बाद दूसरे नंबर पर आने वाला अल्पसंख्यक वर्ग! इस समुदाय की सामाजिक हैसियत एक अदना आदमी की सामाजिक हैसियत से भी गई गुजरी है।

एक बात और, यदि हम अल्पसंख्यक वर्गों का वर्गीकरण उनके सामाजिक और राजनीतिक अधिकारों के आधार पर करें, तो पाएंगे कि कई अल्पसंख्यक वर्गों को सामाजिक राजनीतिक अधिकार मिले हुए हैं और उनका अल्पसंख्यक होना उन्हें इन नागरिक अधिकारों से वंचित नहीं करता। लेकिन दलितों के मामले में स्थिति सर्वथा अलग ही है। कुछ मामलों में तो उन्हें कोई अधिकार प्राप्त ही नहीं है और जहां कुछ मिले हुए भी हैं, वहां बहुसंख्यक वर्ग दलितों को उनके इस्तेमाल से वंचित किए हुए हैं।

इस समिति से मेरा पहला निवेदन यह है कि हमें यह समझ लेना चाहिए कि सभी अल्पसंख्यक वर्ग एक नाव में सवार तो हैं, लेकिन बैठे हैं अलग-अलग श्रेणियों में। जैसे कोई पहले दर्जे में सफर कर रहा है, तो कोई दूसरे दर्जे में और कोई तीसरे दर्जे में। लेकिन दुःख के साथ कहना पड़ता है कि इसी नाव में सवार दलित तीसरे या चौथे दर्जे में तो क्या, पांचवें दर्जे में भी नहीं हैं।

वैसे मैं यह जानता हूं कि कुछ मामलों में दलित वर्गों की हालत भारत के बाकी अल्पसंख्यकों जैसी ही है। दलित वर्ग की तरह अन्य अल्पसंख्यक वर्गों को यह भय है कि भारत का भावी संविधान इस देश की सत्ता को जिन बहुसंख्यकों के हाथों में सौंपेगा, वे और कोई नहीं, रूढि़वादी हिंदू ही होंगे। इन्हें आशंका है कि ये रूढि़वादी हिंदू अपनी रूढि़यों और पूर्वग्रहों को नहीं छोड़ेंगे और जब तक वे अपनी रूढि़यों, कट्टठ्ठरपन और पूर्वग्रह को नहीं छोड़ते, अल्पसंख्यकों के लिए न्याय, समानता और विवेक पर आधारित समाज एक सपना ही रहेगा। अल्पसंख्यकों को इस बात का खतरा है कि कानून बनाने में, प्रशासनिक कार्यों में या अन्य नागरिक अधिकारों जेसे नागरिकता के अधिकार के मामले में उनके साथ पक्षपात बरता जा सकता है। इसलिए ऐसी व्यवस्था को जानना आवश्यक है, जिससे अल्पसंख्यकों का हितरक्षण हो सके ओर इनके साथ भविष्य में पक्षपात का खतरा न रहे।