4. उप-समिति संख्या 3 (अल्पसंख्यक) - Page 49

32 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

इसके लिए अल्पसंख्यकों को विधायिका और कार्यपालिका में प्रतिनिधित्व दिया जाए। देश की सार्वजनिक सेवाओं (नौकरियों) में प्रतिनिधित्व मिले। भविष्य में बहुसंख्यक अपने विधायी अधिकारों का दुरुपयोग करते हुए ऐसा कोई कानून न बनाने पाएं, जो व्यक्ति-व्यक्ति के बीच भेदभाव करता हो। इसके लिए संविधान में ऐसा प्रावधान होना चाहिए, जो भावी केंद्रीय और प्रांतीय विधान-मंडलों में बहुसंख्यकों के विधायी अधिकारों पर अंकुश लगाए, उन्हें ऐसा कानून बनाने से रोके, जो अल्पसंख्यकों के प्रति पक्षपात के परिचायक हों। पक्षपात का यह खतरा सभी अल्पसंख्यक वर्गों के समक्ष है। अतः मैं दलित वर्ग के प्रतिनिधि की हैसियत से इस मामले में अन्य अल्पसंख्यक वर्गों की मांगों का समर्थन करता हूं।

महोदय! अब मैं आपको यह बताने जा रहा हूं कि भारत में दलित वर्ग की स्थिति अन्य अल्पसंख्यक वर्गों से भिन्न है। पहली बात, इस देश में दलितों को कुछ ऐसे नागरिक अधिकार तक प्राप्त नहीं हैं, जो कानूनी रूप से अन्य अल्पसंख्यकों को प्राप्त हैं। मैं एक-दो उदाहरण देकर अपनी बात समाप्त करूंगा, क्योंकि मैं जानता हूं कि मेरे पास समय अधिक नहीं है। पुलिस और सेना में भर्ती का मामला लें, भारत सरकार अधिनियम में यह प्रावधान है कि सार्वजनिक सेवाओं में रोजगार का अधिकार हर व्यक्ति को समान रूप से है। जाति, धर्म या वर्ण के आधार पर किसी को इस अधिकार से वंचित नहीं किया जा सकता। इस कानून के हिसाब से दलित वर्ग का कोई भी व्यक्ति किसी भी सरकारी नौकरी को पाने का हकदार है, बशर्ते कि वह उसके लिए निर्धारित शर्तें पूरी करता हो। लेकिन हो क्या रहा है? जब भी दलित वर्ग का कोई व्यक्ति पुलिस की नौकरी के लिए अर्जी देता है, तो अधिकारी का दो-टूक जवाब होता है कि दलित वर्ग का कोई व्यक्ति पुलिस विभाग में काम नहीं कर सकता, क्योंकि वह अस्पृश्य है। सेना में भी यही स्थिति है। सन् 1892 तक स्थिति यह थी कि मद्रास आर्मी और बंबई आर्मी के लगभग सारे के सारे सैनिक दलित वर्ग के थे। भारत के इतिहास में जितनी भी बड़ी लड़ाइयां लड़ी गईं, उन सबमें मद्रास और बंबई प्रेसिडेंसी के दलित वर्ग के सैनिक ही थे। फिर भी, सन् 1892 में एक कानून बनाकर दलितों की सेना में भर्ती पर रोक लगा दी गई। आज भी यदि लेजिस्लेटिव काउंसिल में यह सवाल उठाया जाए, तो उत्तर मिलेगा कि दलितों की सेना में भर्ती में सबसे बड़ी बाधा उनका अस्पृश्य होना है। हालांकि अब भारत सरकार अधिनियम बन गया है, जिसके तहत दलितों को अन्य लोगों के समान सेवा में भर्ती का अधिकार मिल गया है, लेकिन यह महज कागजी अधिकार है। अस्पृश्यता की कुरीति आज भी इतनी प्रभावी है, जितनी वह कानून बनाकर लागू की जाती।

मैं अन्य भी अनेक उदाहरण दे सकता हूं, जैसे दलितों को यात्रा के समय किसी सार्वजनिक धर्मशाला में नहीं ठहरने दिया जाता, दूसरे वर्गों के लोगों के साथ यात्रा करने से रोका जाता है। जिन विद्यालयों को दलितों ने अपने श्रम से बनाया है, उनमें उनके ही बच्चों को प्रवेश नहीं मिलता। यहां तक कि उन्हें कुएं से पानी तक नहीं भरने दिया