उप-समिति संख्या 3
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जाता। ऐसे अनेक मामले हैं, जिनका ब्यौरा यहां देना आवश्यक नहीं है। मुख्य बात जो दलितों को अन्य अल्पसंख्यकों से अलग करती है, वह यह है कि दलित वर्ग नागरिक अधिकारों से वंचित है, और दलितों को नागरिक अधिकारों से वंचित रखने की परंपरा इतनी मजबूत है, जितनी कि कोई कानून बनाकर की जाती।
दूसरी सबसे महत्वपूर्ण बात है, दलितों का सामाजिक उत्पीड़न। भारत में दलितों का जितना घृणित सामाजिक उत्पीड़न होता है, वैसा दुनिया में शायद ही कहीं होता हो। बंबई प्रेसिडेंसी की सरकार ने 1928 में दलितों की स्थिति का अध्ययन करने के लिए एक समिति गठित की थी। मैं उस समिति की रिपोर्ट का एक छोटा सा अंश पढ़कर सुनाना चाहता हूं। समिति ने यह पता लगाने का प्रयास किया था कि दलितों को अन्य नागरिकों की तरह कानून ने जो अधिकार दिए हैं, उनकी प्राप्ति में कोई बाधा तो नहीं पहुंच रही है। समिति की रिपोर्ट का एक अंशः
समाज में दलित अपने नागरिक अधिकारों का उपयोग बिना किसी बाधा के
कर सकें, इसके लिए हमने कई उपाय सुझाए हैं। लेकिन हमें आशंका है कि
आने वाले समय में दलितों के रास्ते में बाधाएं आएंगी। पहली आशंका तो यही
है कि रूढि़वादी वर्गों के लोग कहीं दलितों के खिलाफ खुली हिंसा पर न उतर
आएं। हमें याद रखना चाहिए कि हर गांव में दलितों का एक छोटा-सा वर्ग रहता
है और बहुसंख्यक आबादी रूढि़वादियों की है। ये कट्टठ्ठरपंथी रूढि़वादी दलितों को
ऐसा कोई कदम नहीं उठाने देंगे, जिससे इन कट्टठ्ठरपंथी रूढि़वादियों की सामाजिक
हैसियत और उनके हित प्रभावित होते हों, उन पर कोई आंच आती हो। वैसे दलितों
के विरुद्ध हिंसा का मार्ग अपनाने से ये लोग थोड़ा कतराएंगे, क्योंकि पुलिस और
मुकदमे का भय रहेगा।
दलितों में नागरिक अधिकारों के रास्ते में दूसरी सबसे बड़ी बाधा उनकी अपनी
आर्थिक स्थिति है। प्रेसिडेंसी के ज्यादातर हिस्सों में दलितों की आर्थिक स्थिति बहुत
खराब है। कुछ लोग गांव के बड़े जमींदारों के यहां बटाई पर खेती करते हैं, जमींदार
जब चाहें उन्हें खेती से बेदखल कर सकते हैं। कुछ लोग जमींदारों के यहां खेतिहर
मजदूर हैं और बाकी लोग इन्हीं जमींदारों के यहां मजदूरी करके उसके बदले में मिले
भोजन या अनाज से अपना पेट पालते हैं। रूढि़वादी जमींदारों की आर्थिक हैसियत
ही इनका सबसे बड़ा हथियार है, जिसके बल पर ये दलितों का उत्पीड़न करते हैं,
उन्हें नागरिक अधिकारों से वंचित रखते हैं। जब भी दलित अपने नागरिक अधिकारों
के लिए आवाज उठाते हैं, उन्हें खेत से बेदखल कर दिया जाता है, मजदूरी करने
से रोक दिया जाता है। गांव की चौकीदारी करने से भी रोक दिया जाता है। दलितों
का इस तरह का बहिष्कार सुनियोजित ढंग से किया जाता है, ताकि वे बाध्य होकर
जमींदारों की शर्तों पर फिर से काम करने लगें। दलितों के लिए गांव के सार्वजनिक
रास्ते तक बंद कर दिए जाते हैं। बनिए सौदा देने से इंकार कर देते हैं। गांव के