34 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
साझा कुएं से पानी भरने पर भी रोक लगा दी जाती है। कभी-कभी तो मामूली-सी
घटना के चलते दलितों का सामाजिक बहिष्कार कर यि जाता है। इस तरह की
कई घटनाएं प्रकाश में आई हैं जैसे किसी दलित ने जनेऊ पहन लिया, जमीन खरीद
ली, अच्छे कपड़े या गहने पहन लिए, दूल्हा घोड़ी पर चढ़कर गांव के आम रास्ते
पर चला आए, तो उनका सामाजिक बहिष्कार कर दिया गया।
दलितों के दमन का सबसे बड़ा हथियार यही सामाजिक बहिष्कार का हथियार
है। दमन के इस सफल तरीके के समक्ष अब खुली हिंसा का तरीका भी कमजोर
पड़ गया है। आप जिससे चाहें संबंध रखें, जिससे चाहें न रखें, इस अधिकार ने
‘सामाजिक बहिष्कार’ के हथियार को कानूनी जामा पहना दिया है, जिससे यह
सबसे खतरनाक हथियार सिद्ध हो रहा है। यदि हमें दलितों का उत्थान करना है,
उन्हें अभिव्यक्ति और कर्म की स्वतंत्रता का अधिकार सही मायनों में देना है, तो
हमें बहुसंख्यकों के इस अत्याचार को हर कीमत पर रोकना होगा।
दूसरी बात, दलितों को एक डर और है। नए विधान-मंडल में दलितों को चाहे जितना प्रतिनिधित्व दिया जाए, कुल मिलाकर उनका स्वरूप एक छोटे वर्ग का ही रहेगा। विधान-मंडल में प्रभुत्व बहुसंख्यक रूढि़वादियों का ही होगा। दलितों के प्रति इस वर्ग का जो व्यवहार है, उसे देखते हुए दलितों के मन में यह भय है कि उनके हितों की अनदेखी की जाएगी, या कुछ ऐसे कदम उठाए जा सकते हैं, जो दलितों के हितों के प्रतिकूल हों। इन सारी बातों के मद्देनजर दलितों के हितों की सुरक्षा के मैं कुछ उपाय सुझा रहा हूं।
सबसे पहले तो प्रस्तावित संविधान में एक ऐसे मौलिक अधिकार की व्यवस्था की जाए, जो सार्वजनिक जीवन में अस्पृश्यता को पूरी तरह अवैध घोषित करे। भावी संविधान के बारे में किसी सहमति पर पहुंचने से पहले हमें इस घृणित सामाजिक कुरीति से पूर्णतः मुक्ति का रास्ता ढूंढना ही होगा। यह मौलिक अधिकार इस तरह की अन्य कुरीतियों को भी दूर करे, जो मानव-मानव के बीच भेदभाव और पक्षपात बरतती हैं। अभी मैंने ‘सामाजिक बहिष्कार’ का उल्लेख किया था। इसके विरुद्ध भी कानून बनना चाहिए। इस बारे में मैंने ज्ञापन में कुछ प्रस्ताव रखे हैं। ये बर्मा में आजकल लागू एक अधिनियम से लिए गए हैं। इस समय इन प्रस्तावों पर मैं विस्तृत चर्चा नहीं करना चाहता। कुल मिलाकर हम चाहते हैं कि दमन और उत्पीड़न रोकने की, जो जिम्मेदारी सरकारी अधिकारियों को सौंपी गई है, उसे और प्रभावी बनाया जाए। फिलहाल भारत सरकार अधिनियम की धाराएं 110 और 111 जो अधिकारियों को यह जिम्मेदारी सौंपती है, बहुत स्पष्ट नहीं है और अंत में हम चाहते हैं कि दलितों को किसी भी तरह के पक्षपात या उनके हितों की अनदेखी के खिलाफ केंद्र सरकार से अपील करने और वहां से असफल होने पर भारत मंत्री के सम्मुख अपील करने का अधिकार मिले। दलितों के उत्थान के लिए भारत सरकार में एक विशेष विभाग बनाया जाए।