4. उप-समिति संख्या 3 (अल्पसंख्यक) - Page 52

उप-समिति संख्या 3

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इस तरह मोटे तौर पर हमने आपको बता दिया है कि दलितों की समस्याएं क्या हैं और वे इनके समाधान के लिए क्या सुरक्षा चाहते हैं। इन उपायों में सबसे महत्वपूर्ण है, विधान-मंडल में दलितों के उचित प्रतिनिधित्व का अधिकार। मैं दो-चार शब्द इस बारे में भी कहना चाहता हूं कि एक बात जिस पर हम सभी सहमत हैं, वह यह है कि प्रतिनिधित्व चुनाव के जरिए हो, नामांकन से नहीं। दलितों के मामले में नामांकन से प्रतिनिधित्व का नतीजा बहुत ही खराब रहा है। इसका इस सीमा तक दुरुपयोग हुआ है कि जिसकी कल्पना भी नहीं की गई थी। नामांकन पद्धति से दलितों को कभी भी उचित और स्वतंत्र प्रतिनिधित्व नहीं मिल पाया। अब इस पद्धति को दलित वर्ग कदापि स्वीकार नहीं करेगा।

जहां तक संयुक्त या पृथक निर्वाचक-मंडल का सवाल है, हमारा मानना है कि यदि ‘समान वयस्क मताधिकार’ का सिद्धांत अपनाया जाता है, तो दलित वर्ग के लोग कुछ समय के बाद (उन्हें थोड़ा समय अपना संगठन बनाने के लिए चाहिए) संयुक्त निर्वाचक-मंडल और सुरक्षित सीटों की बात मान लेंगे। लेकिन यदि वयस्क मताधिकार नहीं अपनाया जाता तो हम अपने लिए पृथक निर्वाचक-मंडल की मांग करेंगे।

जहां तक सीटों की संख्या का सवाल है, इस बारे में कोई निश्चित संख्या अभी तय करना हमारे लिए संभव नहीं है। हां, हम इतना जरूर कहना चाहेंगे कि इस मामले में हम किसी तरह का पक्षपात सहन नहीं करेंगे। हम व्यवहार में समानता चाहते हैं। कुल मिलाकर इस सवाल का जवाब इस बात पर निर्भर है कि शेष अल्पसंख्यक वर्गों को कितनी सीटें दी जाती हैं। इस बारे में, मैं दो बातें कहना चाहूंगा। पहली तो यह कि हमें हिंदुओं से पूर्णतः अलग करके दखा जाए। हमें तो महज राजनीतिक कारणों से हिंदू कहा जाता है। हिंदुओं ने हमें कभी भी सामाजिक तौर से अपना भाई नहीं माना। हमारी संख्या और हमारे वोट की शक्ति का इस्तेमाल कर, उन्होंने सारे राजनीतिक लाभ अपनी झोली में डाल लिए और बदले में हमें कुछ नहीं दिया। बदले में हमें मिला शोषण और उत्पीड़न। हिंदुओं ने हमारे साथ, जो बर्ताव किया है, वैसा तो उन्होंने उन शेष समुदायों के साथ भी नहीं किया, जिन्हें हिंदू नहीं मानते।

तीसरी बात, अधि-प्रतिनिधित्व देने के सिद्धांत को लेकर है। अधि-प्रतिनिधित्व पद्धति का बहुत दुरुपयोग किया गया है। मैं अधि-प्रतिनिधित्व देने के सिद्धांत के विरुद्ध नहीं हूं। मैं इस सिद्धांत के खिलाफ हूँ कि किसी भी दशा में अल्पसंख्यकों को यह लाभ उनकी आबादी के अनुपात में ही मिलना चाहिए। उदाहरण के लिए एक अल्पसंख्यक वर्ग की आबादी बहुत ही कम है। अब अगर आबादी के अनुपात में उसे प्रतिनिधित्व दिया जाएगा, तो वह इतना कम होगा कि इससे अल्पसंख्यकों के हितों की रक्षा का उद्देश्य ही पूरा नहीं हो सकेगा। अतः यदि आप सही मायने में अल्पसंख्यकों का भला करना चाहते हैं, तो कुछ मामलों में इस सिद्धांत को लचीला बनाना होगा। हां, इसके दिए जाने