उप-समिति संख्या 3
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मुद्दे पर बातचीत में रुचि रखते हैं, वे मिलें और हम इसमें डॉ. अम्बेडकर को अवश्य शामिल करें।
डॉ. अम्बेडकरः अध्यक्ष महोदय! मुझे खुशी होगी।
अध्यक्षः हमें इसमें उन्हें शामिल करना चाहिए। हो सकता है विचार-विमर्श से कोई समाधान निकल ही आए।
माननीय पी.सी. मित्तरः महोदय! मैं भी इस विचार-विमर्श में शामिल होना चाहता हूं।
डॉ. अम्बेडकरः अभी हम किस वर्ग को कितना प्रतिशत प्रतिनिधित्व दिया जाए, इस पर चर्चा कर रहे थे। लेकिन तनिक गौर कीजिए कि विभिन्न वर्गों के लिए, जो प्रतिशत सुझाए गए हैं, उनका योग कितना है। यह तो 100 फीसदी के ऊपर निकल जाता है, जबकि अभी पंजाब, बंगाल व अन्य भागों में बसने वाले अनेक अल्पसंख्यक वर्गों को इसमें जोड़ा ही नहीं गया है। वे पूरी तरह छूट गए हैं। अगर सिखों, मुसलमानों और हिंदुओं में ही किसी को 49 प्रतिशत, किसी को 20 प्रतिशत और अन्य को कुछ दे दिया गया, तो बाकी के लिए बचेगा ही क्या? यह नितांत गंभीर सवाल है, जिस पर विचार होना चाहिए।
लेफटी. कर्नल गिडनेः इस बारे में नितांत विनम्रता सहिता मैं भी कुछ कहना चाहूंगा। मैं डॉ. अम्बेडकर से सहमत हूं। आप एक रुपए में से 15 आना तथा नौ पाई बहुसंख्यकों को देंगे और तीन पाई बाकी सभी अल्पसंख्यक वर्गों में बांटना चाहेंगे, यह कैसे स्वीकार्य होगा? मैं अनेक छोटे समुदायों की ओर से यह मांग करता हूं कि इस मामले में कोई न्यायपूर्ण तरीका अपनाया जाए।
अध्यक्षः आपकी बात ठीक है। वैसे हम लोग इस मामले पर पहले भी बात कर चुके हैं और वह बातचीत बड़े ही अनौपचारिक माहौल में हुई थी।
श्री फुटः लेकिन शायद कुछ लिखित में दर्ज नहीं किया गया।
अध्यक्षः अब यदि आप लोग सहमत हों, तो हम माननीय मोहम्मद शफी के सुझावों पर चर्चा करें।
छठी बैठक - 16 जनवरी, 1931
अध्यक्ष महोदयऽः ‘संविधान में ऐसे मौलिक अधिकारों का उल्लेख करना, जो विभिन्न समुदायों को पक्षपात रहित सांस्कृतिक और धार्मिक स्वतंत्रता प्रदान करें’ और ‘स्वतंत्र निर्वहन’, आदि।
राजा नरेन्द्र नाथः इसमें ‘स्वतंत्र एवं समान निर्वहन’ शब्दों को और जोड़ना चाहिए।
अध्यक्षः ‘स्त्रियों और पुरुषों को आर्थिक, सामाजिक और नागरिक अधिकार।’
ऽ प्रोसीडिंग्स ऑफ दि सब-कमेटी नं. 3 (माइनॉरिटीज), पृ. 129-31