उप-समिति संख्या 3
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डॉ. अम्बेडकरः जाति और अस्पृश्यता में हमें भेद करना ही होगा। बहुत-सी जातियों के लोग अस्पृश्य नहीं हैं।
राजा नरेन्द्र नाथः मुसलमानों में भी जातियां हैं।
दीवान बहादुर रामचंद्र रावः अस्पृश्यों के बीच भी जातियां हैं। जाति शब्द का संदर्भ व्यापक है।
श्री फुटः मेरे विचार में अब इस अवसर पर यदि कोई बहुत महत्वपूर्ण संशोधन सुझाया जाए, तभी हम कोई संशोधन करें। अनावश्यक फेर-बदल न करें।
डॉ. अम्बेडकरः मैं चाहता हूं कि अस्पृश्यता के सदंर्भ में सामाजिक और नागरिक अधिकारों का उल्लेख किया जाए।
अध्यक्षः अस्पृश्यता, सामाजिक अधिकारों का उल्लंघन है। यदि आप किसी सामान्य सिद्धांत को किसी विशिष्ट संदर्भ से जोड़ेंगे, तो उस सिद्धांत की महत्ता कम हो जाती है। सामान्य सिद्धांतों को व्यापक संदर्भ में ही देखना चाहिए, तभी वे प्रभावकारी सिद्ध होंगे, इसे किसी एक समस्या से नहीं जोड़ना चाहिए। इसलिए मैं चाहता हूं कि सामाजिक अधिकारों के सिद्धांत को संक्षेप में ही रखने दें, बहुत ज्यादा शब्दों को जोड़ने से उसका महत्व कम होगा।
डॉ. अम्बेडकरः आपकी बात सही है, लेकिन मैं फिर यह कह रहा हूं कि सिद्धांतों की व्याख्या कई तरह से की जा सकती है। मैं चाहता हूं कि इस रिपोर्ट पर आगे, जो भी व्यक्ति कोई कार्रवाई करे, वह इस उप-समिति की इस भावना को जरूर समझे कि हम लोग अस्पृश्यता के आधार पर किसी के साथ भेदभाव बरतने या उसे अयोग्य करार देने के खिलाफ हैं।
अध्यक्षः अगर इस बारे में किसी को कोई आशंका है, तो मैं समिति से परामर्श करके उसे दूर कर दूंगा। डॉ. अम्बेडकर क्या आप अब भी अपनी बात पर अडिग हैं?
डॉ. अम्बेडकरः मेरी आपत्ति दर्ज होनी चाहिए, ताकि सारी बात स्पष्ट रहे।
अध्यक्षः एक सुझाव आया है कि विभेद शब्द की जगह पक्षपात शब्द लिखा जाए। इसे स्वीकार किया जा रहा है।
डॉ. अम्बेडकरः हां, यही उचित है।
अध्यक्षः यह ठीक होगा?
डॉ. अम्बेडकरः बिल्कुल ठीक। मेरा सुझाव है कि वाक्य में आखिर में ‘बिना किसी भेदभाव के’ शब्द आने चाहिएं।
अध्यक्षः तब आप कृपया यह संशोधन करेंगे। फिर यह बिना भेदभाव के पढ़ा जाएगा।
डॉ. अम्बेडकरः हां।
अध्यक्षः ठीक है, कृपया यह संशोधन कर लें। यह अच्छा संशोधन है।
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