4. उप-समिति संख्या 3 (अल्पसंख्यक) - Page 58

उप-समिति संख्या 3

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मैंने कुछ उपाय सुझाए हैं कि कैसे दलितों के अधिकारों की रक्षा की जा सकती है। क्या कुछ किया जाए कि दलित संविधान में दिए गए अधिकारों का बिना किसी बाधा के उपयोग कर सकें। जरूरी नहीं कि मेरे सुझाव से समिति के लोग संतुष्ट हों, वे चाहें तो अन्य बेहतर उपाय भी सुझा सकते हैं। मैं तो बस इतना चाहता हूं कि जो दस्तावेज तैयार किया जा रहा है, उसमें यह बात दर्ज होनी चाहिए कि दलित वर्ग के लोग संविधान में मौलिक अधिकारों की घोषणा मात्र से संतुष्ट नहीं होंगे। वे चाहते हैं कि संविधान उनके इन अधिकारों क स्वतंत्र उपयोग की गारंटी भी दे। इसे अमल में कैसे लाया जा सकता है, इस पर मैंने अपने ज्ञापन में कुछ कार्यविधियां सुझाई हैं।

श्री फुटः डॉ. अम्बेडकर के साथ मेरी पूरी सहानुभूति है, लेकिन एक बात मैं कहना चाहूंगा कि अगर हम अलग-अलग वर्गों की अलग-अलग मांगों को जोड़ेंगे, तो बड़ी मुश्किल होगी। हमने मांगों पर सहानुभूतिपूर्वक विचार किया है और पैराग्राफ 16 के अंत में शामिल भी कर लिया है। अब अलग-अलग मांगों को ब्यौरेवार जोड़ना होगा।

डॉ. अम्बेडकरः पैराग्राफ 16 के अंतिम दो वाक्य दलितों के लिए सीटों के बंटवारे तक ही सीमित हैं। यह मामला अलग है। मैं जिस बात पर जोर दे रहा हूं, वह यह है कि संविधान हमें चाहे, जो अधिकार दे दे, भारत की 99 फीसदी जनता हमें इन अधिकारों का उपयोग नहीं करने देगी। इन कागजी अधिकारों का मेरे लिए, तब तक क्या मतलब होगा, जब तक कि संविधान यह गारंटी न दे कि, जो भी इन अधिकारों का हनन करेगा, उसे दंड दिया जाएगा। मैं इस पर जोर नहीं दूंगा कि समिति मेरे प्रस्तावों को मंजूर कर ले। मैं इतना चाहता हूं कि दलित वर्ग की ओर से मैंने जो भी मांगें रखी हैं, संविधान में उन्हें स्थान मिले।

अध्यक्षः मुझे आपसे पूरी सहानुभूति है। लेकिन संविधान में मौलिक अधिकारों की घोषणा करने वाला एक पैराग्राफ जोड़ना और इन अधिकारों का निर्वहन करने वाले कानून बनाने में बड़ा अंतर है। भविष्य में जिन कानूनों के तहत इन अधिकारों को अमल में लाया जाएगा, आप उन सबका संविधान में उल्लेख नहीं कर सकते। संविधान में मौलिक अधिकारों की घोषणा के बाद जब आपके प्रतिनिधि विधान-मंडल में पहुंचें, तो वे अन्य प्रतिनिधियों के साथ मिलकर ऐसे कानून बनाएं, जिनसे इन अधिकारों को अमल में लाया जा सके। यदि आप सारी बातें संविधान में ही लिखवाना चाहेंगे, तो संविधान बनाना ही मुश्किल हो जाएगा।

डॉ. अम्बेडकरः मैं आपसे सहमत हूं। मौलिक अधिकारों की घोषणा मात्र से क्या होने वाला है। किसी व्यक्ति को यह बताना कि तुम्हारे ये अधिकार हैं, नाकाफी है, जब तक यह सुनिश्चित न हो जाए कि वह इन अधिकारों का इस्तेमाल कर सकता है, कोई बाधा आएगी, तो उसे दूर किया जाएगा। संविधान में यह गारंटी अवश्य दी जानी चाहिए। महज यह घोषणा कर देने से कि अस्पृश्यता खत्म हो गई, फलां चीज खत्म हो गई, तो काम नहीं चलेगा।