42 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
अध्यक्षः हम सारी बातें समझ गए हैं, इसलिए उसे बार-बार दोहराने से क्या लाभ। डॉ. अम्बेडकर का कहना है किस संविधान में मौलिक अधिकारों की घोषणा का तब तक कोई अर्थ नहीं है, जब तक कि इसे कानूनी रूप से लागू करने की गारंटी नहीं दे दी जाती। कानून द्वारा इसे लागू करने के लिए ऐसे कानून होंगे, जो मौलिक अधिकारों के हनन से संबद्ध अपराधों को परिभाषित करें और दंड सुनिश्चित करें। इस मामले में अपराधों को परिभाषित करना आसान काम नहीं है। लॉर्ड रीडिंग यहां बैठे हैं। वह वकील हैं। मैं तो वकील हूं नहीं। इस बारे में वह बेहतर बता सकते हैं, पर मेरा मानना है कि संविधान आपको कुछ अधिकार देता है। उसके साथ मौलिक अधिकारों के हनन से संबद्ध अपराध और दंड की व्यवस्था जोड़ना उचित नहीं है। मान लीजिए, वास्तव में इन मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करते हुए किसी दलित को प्रताडि़त किया जाता है, तो क्या वह न्याय पाने के लिए अदालत में नहीं जा सकता?
लॉर्ड रीडिंगः उसे न्याय तो मिलना ही चाहिए और इस तरह के कृत्य को अपराध मानना चाहिए।
अध्यक्षः क्या इसे संविधान में लिखा जाना चाहिए?
लॉर्ड रीडिंगः नहीं, मेरा तात्पर्य यह नहीं है। वैसे जहां तक मैं समझ रहा हूं, डॉ. अम्बेडकर भी यह नहीं चाह रहे हैं। वह महज इतना चाहते हैं कि उनकी यह बात दर्ज कर ली जाए कि मौलिक अधिकारों की घोषणा ही काफी नहीं है। यह सुनिश्चित करना भी आवश्यक है कि इन अधिकारों का हनन नहीं होने पाए। इसके लिए कुछ उपाय किए जाएं। डॉ. अम्बेडकर मात्र यही चाहते हैं। अब उपाय तलाशना आपका काम है।
डॉ. अम्बेडकरः बिल्कुल ठीक।
रिपोर्ट के पैराग्राफ 4 पर चर्चा
डॉ. अम्बेडकरः पैराग्राफ 4 के दूसरे उप-पैरा में मैं एक संशोधन चाहता हूं। इसमें ‘शुरू का कुछ समय छोड़कर’ शब्द जोड़ दिए जाएं। अब यह इस तरह पढ़ा जाएगा, ‘शुरू का कुछ समय छोड़कर दलित वर्गों को सब स्वीकार्य होगा।’
अध्यक्षः हां, मैं समझ रहा हूं, आपने शायद इसके साथ वयस्क मताधिकार की शर्त भी जोड़ दी है।
डॉ. अम्बेडकरः मैंने 10 वर्ष की अवधि के लिए पृथक निर्वाचक-मंडल की बात कही है, चाहे वयस्क मताधिकार हो, या न हो।
अध्यक्षः ‘संक्रमण काल के बाद दलित वर्गों को स्वीकार्य होगा।’
डॉ. अम्बेडकरः हां।
अध्यक्षः क्या इसके जोड़ने से यह ज्यादा यथार्थवादी हो जाएगा?