48 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
- उप-समिति संख्या 2 (प्रांतीय संविधान) के इस सुझाव पर आम सहमति है कि नए संविधान के सफलतापूर्वक कार्य करने के लिए प्रांतीय कार्यपालिकाओं में महत्वपूर्ण अल्पसंख्यक समुदायों का प्रतिनिधित्व सर्वाधिक आवश्यक है और इस बात पर भी सहमति है कि इसी आधार पर संघीय कार्यपालिका में मुसलमानों को प्रतिनिधित्व दिया जाए। छोटे अल्पसंख्यक वर्गों की ओर से यह मांग की गई है कि उन्हें भी प्रांतीय और संघीय कार्यपालिकाओं में प्रतिनिधित्व दिया जाए और अगर ऐसा करना असंभव हो, तो प्रत्येक मंत्रिमंडल में एक ऐसे मंत्री की नियुक्ति की जाए, जिस पर अल्पसंख्यक वर्गों के हितों की रक्षा की जिम्मेदारी हो।
(डॉ. अम्बेडकरः और सरदार उज्ज्वल सिंह चाहते हैं कि पंक्ति 6 में ‘मुसलमानों’ शब्द के बाद ‘और अन्य महत्वपूर्ण अल्पसंख्यक वर्ग’ शब्द जोड़ दिए जाएं।)ऽ
रिपोर्ट के पैराग्राफ 18 पर बहस
अध्यक्ष [] ः 17 को निकाल दिया गया है। अब 18 पर बात करें, जो बाद में 17 हो जाएगा। यह रिपोर्ट पूर्ण सम्मेलन की समिति के समक्ष रखी जाने वाली है।
कौन-कौन लोग इसके समर्थन में हैं? और कौन-कौन विरोध में? तो इसे स्वीकार कर लिया गया। अब इसे पूर्ण सम्मेलन की समिति के समक्ष भेजा जा सकता है।
डॉ. अम्बेडकरः मेरा एक संशोधन है।
अध्यक्षः अब कुछ नहीं, मैं माफी चाहता हूं।
डॉ. अम्बेडकरः मेरे संशोधन को पैराग्राफ 16 के बाद एक अलग पैराग्राफ के रूप में दर्ज किया जा सकता है।
अध्यक्षः उसे अंतिम पैराग्राफ बनाएं?
डॉ. अम्बेडकरः जी हां।
अध्यक्षः तब तो यह अभिभावी पैराग्राफ है।
डॉ. अम्बेडकरः मेरा संशोधन है, ‘अल्पसंख्यक और दलित वर्ग के लोगों का यह दृढ़ निश्चय है कि जब तक उनकी मांगें स्वीकार नहीं की जातीं, तब तक वे भारत के किसी भी भावी संविधान को अपनी सहमति नहीं देंगे।’
अध्यक्षः वस्तुतः आप यह बात कह चुके हैं और हम मान चुके हैं कि यह आपका निजी बयान नहीं है।
डॉ. अम्बेडकरः मेरे विचार में इसे दर्ज करना चाहिए।
ऽ प्रोसीडिंग्स ऑफ दि सब-कमेटी नं. 3 (माइनॉरिटीज), पृ. 153पैराग्राफ संख्या 12 उप-समिति संख्या 3 पर चर्चा के बाद स्वीकृत रूप में।