52 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
- समाज में दलित अपने नागरिक अधिकारों का उपयोग बिना किसी बाधा के कर सकें, इसके लिए हमने कई उपाय सुझाए हैं। लेकिन हमें आशंका है कि आने वाले समय में दलितों के रास्ते में बाधाएं आएंगी। पहली आशंका तो यही है कि रूढि़वादी वर्गों के लोग कहीं दलितों के खिलाफ खुली हिंसा पर न उतर आएं। हमें याद रखना चाहिए कि हर गांव में दलितों का एक छोटा-सा वर्ग रहता है और बहुसंख्यक आबादी रूढि़वादियों की है। ये कट्टठ्ठरपंथी रूढि़वादी दलितों को ऐसा कोई कदम नहीं उठाने देंगे, जिससे इन रूढि़वादियों की सामाजिक हैसियत और उनके हित प्रभावित होते हों, उन पर कोई आंच आती हो। वैसे दलितों के खिलाफ खुली हिंसा का रास्ता अपनाने से ये लोग थोड़ा कतराएंगे, क्योंकि पुलिस और मुकदमे का डर रहेगा।
दलितों के नागरिक अधिकारों के रास्ते में दूसरी सबसे बड़ी बाधा उनकी अपनी आर्थिक स्थिति है। प्रेसिडेंसी के ज्यादातर हिस्सों में दलितों की आर्थिक स्थिति बहुत
खराब है। कुछ लोग गांव के बड़े जमींदारों के यहां बंटाई पर खेती करते हैं, जमींदार जब चाहें उन्हें खेती से बेदखल कर दें। कुछ लोग जमींदारों के यहां खेतिहर मजदूर हैं और बाकी लोग इन्हीं जमींदारों के यहां मजदूरी करके उसके बदले में मिले भोजन व अनाज से अपना पेट पालते हैं। रूढि़वादी जमींदारों की आर्थिक हैसियत ही इनका सबसे बड़ा हथियार है, जिसके बल पर ये लोग दलितों का उत्पीड़न करते हैं, उन्हें नागरिक अधिकारों से वंचित रखते हैं। जब भी दलित अपने नागरिक अधिकारों के बारे में आवाज उठाते हैं, उन्हें खेत से बेदखल कर दिया जाता है, मजदूरी करने से रोक दिया जाता है, गांव की चौकीदारी करने से भी रोक दिया जाता है। दलितों का इस तरह का बहिष्कार सुनियोजित तरीके से किया जाता है, ताकि वे मजबूर होकर जमींदारों की शर्तों पर फिर से काम करने लगें। दलितों के लिए गांव के सार्वजनिक रास्ते बंद कर दिए जाते हैं। बनिए सौदा देने से इंकार कर देते हैं।
गांव के साझा कुएं से पानी भरने पर भी रोक लगा दी जाती है। कभी-कभी तो बहुत मामूली-सी बात पर दलितों का सामाजिक बहिष्कार कर दिया जाता है। इस तरह की कई घटनाएं प्रकाश में आई हैं। जैसे किसी दलित ने जनेऊ पहन लिया, जमीन खरीद ली, अच्छे कपड़े या गहने पहन लिए, दूल्हा घोड़ी पर चढ़कर गांव के आम रास्ते पर चले, तो उनका सामाजिक बहिष्कार कर दिया गया।
हमें नहीं पता है कि दलितों का दमन करने के लिए सामाजिक बहिष्कार से अधिक प्रभावी हथियार भी बनाया जा सकता है। इसके आगे तो खुली हिंसा का तरीका भी निरर्थक हो जाता है, क्योंकि इसके बहुत ही भयंकर और दूरगामी परिणाम होते हैं। यह अत्यंत भयानक हथियार इसलिए है, क्योंकि संपर्क की स्वतंत्रता के सिद्धांत के अनुरूप इसे एक कानूनी तरीका माना गया है। अगर हमें दलितों का उत्थान करना है, उन्हें अभिव्यक्ति और कर्म की स्वतंत्रता का अधिकार सही मायने में देना है, तो हमें