उप-समिति संख्या 3
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समान रूप से इस्तेमाल करने का अधिकार। सरकार उचित कारणों से कुछ
प्रतिबंध लगा सकती है, बशर्ते ये शर्तें या प्रतिबंध सभी नागरिकों पर समान
रूप से लागू होते हों।
(4) सार्वजनिक हित में गठित किसी धर्मार्थ ट्रस्ट का लाभ बिना किसी भेदभाव
के पाने का अधिकार। यदि वह किसी धर्म विशेष के लिए गठित है, तो
इस धर्म के सभी लोगों को बिना किसी भेदभाव के इसका लाभ मिलने का
अधिकार।
(5) नागरिकों के जीवन और संपत्ति की रक्षा के लिए बने कानूनों और कानूनी
प्रक्रियाओं का अन्य नागरिकों की तरह समान रूप से लाभ उठाने का अधिकार।
इसमें अस्पृश्यता की कोई पूर्व शर्त या परंपरा आड़े नहीं आनी चाहिए।
शर्त 4
विधान-मंडल में समुचित प्रतिनिधित्व
दलित वर्ग अपने हितों की रक्षा के लिए विधायिका और कार्यपालिका पर अपना प्रभाव डाल सकें, इसके लिए उन्हें पर्याप्त राजनीतिक अधिकार मिलने चाहिएं। इसके लिए चुनाव कानून में निम्नांकित चीजें जोड़ी जाएं-
(1) प्रांतीय और केंद्रीय विधान-मंडलों में पर्याप्त प्रतिनिधित्व का अधिकार,
(2) अपने ही लोगों को अपना प्रतिनिधि चुनने का अधिकार।
(क) वयस्क मताधिकार द्वारा ओर (ख) शुरू के 10 वर्ष के लिए पृथक निर्वाचक-मंडलों
द्वारा और उसके बाद संयुक्त निर्वाचक-मंडलों और आरक्षित सीटों द्वारा। यह
स्पष्ट करना भी आवश्यक है कि संयुक्त निर्वाचक-मंडल की बात दलित वर्ग
तभी मानेगा, जब चुनाव वयस्क मताधिकार के आधार पर होगा।
नोटः दलितों के लिए पर्याप्त प्रतिनिधित्व क्या है? इस बारे में कोई संख्या बताना, तब तक संभव नहीं है, जब तक कि यह पता न चल जाए कि अन्य समुदायों को कितनी सीटें मिल रही हैं। यदि दूसरे समुदायों को दलितों से बेहतर प्रतिनिधित्व दिया जाएगा, तो दलित इसे कभी स्वीकार नहीं करेंगे। वैसे मद्रास और बंबई में दलितों को अन्य अल्पसंख्यकों की तुलना में ज्यादा प्रतिनिधित्व तो मिलना ही चाहिए।
शर्त 5
नौकरियों में पर्याप्त प्रतिनिधित्व
सरकारी नौकरियों में ऊंची जाति के अधिकारियों ने दलितों को बहुत सताया है। अपने अधिकारों और कानून का अपनी जातियों के हितों के लिए गलत ढंग से इस्तेमाल किया है। न्याय, समानता और विवेक के सिद्धांत की धज्जियां उड़ाई हैं, दलितों का भयावह शोषण किया है। इसे रोकने का एक ही उपाय है, सरकारी नौकरियों पर हिंदू सवर्णों के एकाधिकार को समाप्त करना। नौकरियों में भर्ती की ऐसी पद्धति अपनाई जाए, ताकि दलित समेत समाज के अन्य अल्पसंख्क वर्गों के लोग भी उचित हिस्सा पा सकें। इस उद्देश्य की प्राप्ति के लिए दलितों की मांग है कि संविधान में निम्नांकित चीजें जोड़ी जाएं-