4. उप-समिति संख्या 3 (अल्पसंख्यक) - Page 74

उप-समिति संख्या 3

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शर्त 7

विशेष विभागीय देखभाल

दलितों की वर्तमान दुर्दशा के लिए बहुसंख्यक रूढि़वादी ही जिम्मेदार हैं। ये किसी भी हालत में दलितों को अपने बराबर नहीं आने देंगे। यह कहना ही काफी नहीं है कि दलित बहुत गरीब हैं, भूमिहीन हैं, इस तथ्य को दृष्टिगत रखना चाहिए कि दलितों की दयनीय आर्थिक स्थिति का कारण यह है कि जीवन-यापन के सारे रास्ते उनके लिए बंद हैं और यह सब सामाजिक पूर्वग्रहों के कारण हैं। यह एक ऐसा तथ्य है, जो दलितों को अन्य सामान्य जातियों के श्रमिकों से अलग करता हैं। इसके चलते कई बार दलितों और अन्य निचली जातियों के बीच संघर्ष की नौबत तक आ जाती है। दलितों पर तरह-तरह के भयावह अत्याचार किए जाते हैं। दलितों में इतनी क्षमता नहीं है कि वे अपने लिए बचाव का रास्ता ढूंढ सकें। पूरे भारत में दलितों पर कैसे-कैसे अत्याचार किस-किस तरह किए जाते हैं, इसका ब्यौरा मद्रास सरकार राजस्व बोर्ड की रिपोर्ट (5 नवंबर, 1882, संख्या 723) में है। इसका सारांशः-

  1. अत्याचार के अनेक तरीके हैं। पेरिया लोगों को मालिकों की बात न मानने पर-

(क) ग्राम पंचायतों या फौजदारी अदालतों में झूठे मुकदमे दर्ज कराए जाते हैं।

(ख) पेरिया लोगों की बस्तियों के आसपास की जमीन सरकार से पट्टठ्ठे पर ले ली

जाती है, जिससे पेरिया अपने पशुओं को वहां चरा न सकें या सवर्णों के

मंदिर में प्रवेश न कर सकें।

(ग) पेरिया लोगों की जमीन हड़पने के लिए सरकारी दस्तावेजों में फर्जी नाम दर्ज

करा दिए जाते हैं।

(घ) झोपडि़यां गिरा दी जाती हैं।

(घ) पीढि़यों से चली आ रही काश्तकारी से बेदखल कर दिया जाता है।

(च) फसलें काट ली जाती हैं और विरोध करने पर उल्टा पेरिया लोगों के खिलाफ

चोरी और दंगे के मुकदमें दायर कर दिए जाते हैं।

(छ) सादे कागज पर अंगूठा लगवा लिया जाता है और बाद में इस पर, जो चाहे

लिखकर पेरिया लोगों को सताया जाता है।

(ज) खेतों में पानी ले जाने से रोका जाता है।

(झ) ब्याज नहीं चुकाने पर बिना किसी कानूनी नोटिस के पेरिया लोगों की संपत्ति

कुर्क कर ली जाती है।

  1. वैसे इस तरह के अत्याचारों के खिलाफ न्याय पाने के लिए दीवानी और

फौजदारी अदालतें हैं, लेकिन ये दलितों की पहुंच से बहुत दूर हैं। अदालत में वही

जा सकता है, जिसके पास वकील की फीस देने के लिए पैसा हो, अदालत तक

जाने का किराया हो और लंबी अवधि तक मुकदमा लड़ने के लिए रोजी-रोटी का

पक्का इंतजाम हो। दूसरी बात, ज्यादातर मामलों में निचली अदालत का फैसला ही