महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है और इन निचली अदालतों में फैसला ज्यादातर भ्रष्ट
अधिकारी, जो जमींदारों की ही मदद करते हैं, उन्हीं के पक्ष में फैसला सुनाते हैं।
- प्रशासन में इस वर्ग की पहुंच कितनी है, यह बताने की आवश्यकता नहीं।
हर कार्यालय में ऊपर से नीचे तक इन्हीं के लोग भरे हैं। इस हालत में इनके हितों
की अनदेखी कैसे हो सकती है। इस तरह का कोई प्रयास किया भी गया, तो ये
अपने प्रभाव का इस्तेमाल कर, उसे रुकवाने या निष्प्रभावी बनाने के लिए कोई
कसर उठा नहीं रखेंगे।
इन सारे तथ्यों के मद्देनजर एक बात तो साफ हो गई है कि यदि दलितों को वास्तव में न्याय दिलाना है, तो यह दायित्व सरकार को लेना होगा। कुछ निश्चित नीतियां बनानी होंगी और उन पर अमल के तरीके तय करने होंगे। यह देखना सरकार की जिम्मेदारी होगी कि दलित भी औरों की तरह अपने अधिकारों का स्वतंत्र उपयोग कर पा रहा है या नहीं। जो भी बाधाएं हैं, उन्हें दूर करना सरकार का काम है। इस उद्देश्य की प्राप्ति के लिए दलित चाहते हैं कि सरकार में एक अलग विभाग बनाया जाए। भारत सरकार पर ऐसा विभाग बनाने की कानूनी जिम्मेदारी डालने के लिए भारत सरकार अधिनियम में निम्नलिखित धाराएं जोड़ी जाएंः
(1) नए संविधान के लागू होने के साथ ही भारत सरकार में दलितों के हितों की
रक्षा और उनके उत्थान के लिए एक अलग विभाग बनाया जाए, जिसका प्रमुख
एक मंत्री हो।
(2) मंत्री इस विभाग का कामकाज तब तक देखेगा, जब तक कि उसे केंद्रीय
विधान-मंडल का विश्वास प्राप्त हो।
(3) मंत्री का काम यह देखना होगा कि पूरे भारत में कहीं भी दलितों के साथ
सामाजिक अन्याय, उनका शोषण और उत्पीड़न न होने पाए। इस तरह के किसी
भी मामले को रोकने के लिए, वह प्रभावी कदम उठाएगा। इसके अलावा,
दलितों के उत्थान के लिए भी वह कदम उठाएगा।
(4) गवर्नर जनरल को कानूनी रूप से निम्नांकित अधिकार होंगे-
(क) दलितों के कल्याण के लिए शिक्षा, स्वास्थ्य, इत्यादि से संबद्ध किसी
अधिनियम के तहत प्राप्त अधिकारों, जिम्मेदारियों को वह पूरी तरह या
आंशिक रूप से मंत्री को सौंप सकता है।
(ख) प्रत्येक प्रांत में ‘दलित वर्ग कल्याण ब्यूरो’ बना सकता है, जो मंत्री के
अधीन काम करेगा और उसे सहयोग देगा।
शर्त 8
दलित वर्ग और मंत्रिमंडल
दलितों ने अपने हितों की रक्षा के लिए विधान-मंडल में प्रतिनिधित्व मांगा है।