4. उप-समिति संख्या 3 (अल्पसंख्यक) - Page 77

60 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

हो पाएगी, पृथक निर्वाचक-मंडल की मांग है। इस योजना पर जो सामान्य आपत्ति उठी थी, उस पर पहले ही भारत में बहत चर्चा हो चुकी है। इसमें एक ऐसी समस्या निहित है, जिसका समाधान बहुत कठिन है, अर्थात् वह है कि विभिन्न प्रांतों और केंद्र में सांप्रदायिक प्रतिनिधित्व कितना हो, साथ ही यदि किसी विधान-मंडल में सभी या लगभग सभी स्थान समुदायों को सौंप दिए जाएं, तो स्वतंत्र राजनीतिक मत अथवा असल राजनीतिक दलों के विकास की कोई गुंजाइश नहीं रहेगी और दलित वर्गों के प्रतिनिधियों द्वारा इस समस्या के उठाए जाने पर यह और भी जटिल हो गई कि उन्हें हिंदू जनसंख्या में से घटाकर निर्वाचन संबंधी प्रयोजनों के लिए पृथक समुदाय माना जाए।

  1. उप-समिति संख्या 2 (प्रांतीय संविधान) की इन सिफारिशों पर आम सहमति थी कि महत्वपूर्ण अल्पसंख्यक समुदायों की प्रांतीय कार्यपालिकाओं में प्रतिनिधित्व का नए संविधान के सफल कार्यान्वयन के लिए सबसे अधिक महत्व है और इस पर भी सहमति व्यक्त की गई थी कि इसी आधार पर मुसलमानों को संघीय कार्यपालिकाओं में भी प्रतिनिधित्व दिया जाना चाहिए। इसमें डॉ. अम्बेडकर ने ‘मुसलमानों के बाद’ ‘और अन्य महत्वपूर्ण अल्पसंख्यक’ शब्द जोड़ें। छोटे समुदायों की ओर से प्रांतीय और संघीय कार्यपालिकाओं में व्यक्तिगत अथवा सामूहिक रूप से अपने प्रतिनिधित्व के लिए मांग की गई और यदि उस प्रकार का प्रतिनिधित्व संभव न हो, तो प्रत्येक मंत्रिमंडल में एक मंत्री हो, जिसे अल्पसंख्यकों के हितों की रक्षा करने का दायित्व विशेष रूप से सौंपा जाए।

  2. जहां तक प्रशासन का संबंध है, इस बात पर सहमति व्यक्त की गई कि प्रांतीय तथा केंद्रीय सेवाओं की भर्ती लोक सेवा आयोगों को सौंप दी जाए और उन्हें यह अनुदेश दिए जाएं कि वे लोग सेवाओं में विभिन्न समुदायों के समुचित तथा पर्याप्त प्रतिनिधित्व के दावेदारों की भर्ती करें, लेकिन इस बात का ध्यान रखें कि अर्हता का उचित मानदंड बरकरार रखा जाए।

  3. यह भी स्पष्ट कर दिया गया है कि ब्रिटिश सरकार यदि समुदायों पर कोई ऐसा निर्वाचन सिद्धांत आरोपित करेगी, जिसके किसी-न-किसी अंश से असहमति की आशंका हो, तो उसका वे विरोध करेंगे। इस प्रकार यह बात स्पष्ट हो गई कि सहमति न होने की स्थिति में पृथक निर्वाचक-मंडल, चाहे उनमें कितनी ही कमियां या कठिनाइयां क्यों न हों, नए संविधान के अधीन निर्वाचन व्यवस्थाओं के आधार के रूप में बनाए रखे जाएंगे। इससे अनुपात का प्रश्न उपस्थित होगा। ऐसी परिस्थितियों में दलित वर्गों के दावों पर पर्याप्त रूप से विचार किया जाना आवश्यक होगा।

  4. अल्पसंख्यक तथा दलित वर्ग अपने उस दावे पर अटल थे कि यदि उनकी मांगें उचित रूप से पूरी न की गईं, तो वे भारत के स्वशासन के किसी संविधान पर सहमत नहीं होंगे।