5. उप-समिति संख्या 6 (मताधिकार) - Page 79

62 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

विश्वास न हो जाए कि जिन लोगों की ओर से मैं बोल रहा हूं, उन्हें उस संविधान में स्थान मिलेगा। मुझे अपने सभी मित्रों को यह बात स्पष्ट रूप से बता देनी चाहिए कि क्योंकि मेरे कुछ मित्रों ने वयस्क मताधिकार के प्रस्ताव पर आपत्ति की है, इसलिए उसके विरोध में, जो तर्क प्रस्तुत किए गए हैं, मैं उन पर चर्चा करना चाहूंगा।

एक तर्क यह भी प्रस्तुत किया गया है कि हमें इस देश में निर्धारित इस पूर्वोदाहरण को स्वीकार कर लेना चाहिए कि वयस्क मताधिकार चरणबद्ध ढंग से किया जाना चाहिए। यह सुझाव दिया गया है कि हमें उन्हीं चरणों को अपना लेना चाहिए, जो इस देश में 1832 से 1918 तक अपनाए गए थे। जिन लोगों ने यह रुख इस देश में मताधिकार दिए जाने के राजनीतिक इतिहास को दृष्टिगत रखकर अपनाया है, वे शायद यह समझते हैं। कि अंग्रेजों ने 1832 के बाद से जनता को मताधिकार देने के लिए जो कदम उठाए थे, वे किसी दार्शनिक प्रक्रिया अपनाने का परिणाम थे। उन्होंने पहले से ही यह निर्णय कर लिया था कि हमें 1832 में सीमित संख्या में ही लोगों को मताधिकार देना चाहिए, क्योंकि अन्यथा ऐसा करना दार्शनिक दृष्टि से गलत होगा, उन्हें अगला कदम 1866 के बजाए 1868 में ही उठाना चाहिए। और बाद में अगला कदम 1866 में नहीं, बल्कि 1867 में उठाना चाहिए और इसी प्रकार उससे अगला कदम 1867 में न उठाकर 1884 में उठाना चाहिए। मुझे नहीं मालूम कि, जो इस प्रकार का तर्क देते हैं, उनका यह विश्वास है कि इस तथ्य के पीछे कोई दार्शनिक विश्वास काम कर रहा था। लेकिन मैं अपने उन मित्रों को यह बता देना चाहता हूं कि यदि आप इंग्लैंड के राजनीतिक इतिहास का अध्ययन करें, तो आप देखेंगे कि न केवल ब्रिटिश लोगों द्वारा उठाए गए कदमों के निर्धारण के पीछे कोई दार्शनिक विश्वास नहीं था, बल्कि मताधिकार के प्रश्न पर इसी देश में महज दलगत राजनीति के मामले के रूप में उस पर विचार किया गया था। प्रत्येक दल ने मताधिकार के विस्तार या प्रयत्न इसलिए किए कि उसने सोचा कि राजनीतिक नारे के रूप में इसका इस्तेमाल करने से उस दल का प्रभाव-क्षेत्र बढ़ेगा और उस दल को बल मिलेगा। शायद यह बात मेरे मित्र को चौंकाए, जिन्होंने इसी तर्क का प्रयोग किया और मुझे यह कहने में भी संकोच नहीं कि वे इसका हमेशा इस्तेमाल करते हैं और उन्हें इससे एक प्रकार की संतुष्टि होती है और वे यह महसूस करते हैं कि उन्होंने हमारे मार्ग में एक असाध्य बाधा उपस्थित कर दी है। हमें यह जानकर प्रसन्नता होगी कि इंग्लैंड की जनता को राजनीतिक मताधिकार दिए जाने की दिशा में उठाए गए कदमों में वह एक था, जो उदारवादियों अथवा उग्र सुधारवादियों ने नहीं, बल्कि इसी देश की अनुदार सरकार ने उठाया था।

अपने मित्र से जो दूसरी बात मैं पूछना चाहता हूं वह यह है कि क्या उनका हमसे कहने का यही अभिप्राय है कि इस देश में मताधिकार सीमित था और इसी कारण उस मताधिकार के अंतर्गत, जो सरकार बनी वह अच्छी सरकार थी, यानि ऐसी सरकार जिसका लक्ष्य लोगों का कल्याण और जनता की खुशहाली थी। क्या अपनी बात से वह