64 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
जीवन और उसकी संपत्ति पर आघात करते हों। यह केवल मत पेटी का प्रश्न नहीं है, न ही वह मतदान केंद्रों का प्रश्न है।
मुझे उसे प्रकारांतर से कहने की अनुमति दें। यदि मैं मताधिकार का सही अर्थ समझता हूं, तो मैं यह भी जानता हूं कि यह उन शर्तों के नियमन का अधिकार है, जो समाज में सम्मिलित जीवन यापन की शर्तें होती हैं और यही मातधिकार का सार है। जब आप किसी व्यक्ति को मताधिकार देते हैं, तो उससे आपका मंतव्य यही होता है कि आप उसे उन शर्तों के नियमन का अधिकार प्रदान कर रहे हैं, जिनके अनुसार आचरण करके वह समाज में अन्य व्यक्तियों से संबंध रखते हुए जीवन यापन करेगा। अतः मताधिकार का यदि यही अर्थ है, तो जाहिर है कि यह नहीं हो सकता कि आप उच्च वर्गों, जिन्हें बुद्धिजीवी के नाम से पुकारा जाता है, या धनी वर्गों को तो सहयोजित जीवन की शर्तों को नियमित करने का अधिकार दें और निम्न वर्गों को, उससे वंचित कर दें। उन्हें भी सहयोजित जीवन की शर्तों के नियमन का अधिकार मिलना चाहिए। जिस प्रकार यदि एक पूंजीपति को, यदि किसी संविधान के तहत इस बात का अधिकार दिया जाता है कि वह सहयोजित जीवन की शर्तें श्रमिकों पर लागू करे, तो उसी प्रकार श्रमिकों को भी उन शर्तों के नियमन का अधिकार मिलना चाहिए, जिसके अनुसार वह अपने पूंजीपति स्वामी के साथ रह सकें। यह एकतरफा सौदा नहीं हो सकता, न ही इसे एकतरफा सौदा होना चाहिए। यदि आप मताधिकार शब्द का सही अर्थ समझते हैं, तो मुझे लगता है कि मताधिकार कुछ ऐसी चीज है, जिसे राज्य के प्रत्येक व्यक्ति का जन्मजात अधिकार माना जाना चाहिए और यदि आप समझते हैं कि मताधिकार प्रत्येक पुरुष या स्त्री का, जो उसे समझ सकता है, जन्मजात अधिकार है, तो आप लोगों के उस जन्मजात अधिकार को अपने प्रशासन की सुविधा का आश्रित नहीं बना सकते। मेरे मित्र ने यह तर्क दिया है कि हमें वयस्क मताधिकार इसलिए स्वीकार्य नहीं है, क्योंकि हमारे यहां मतदान केंद्रों और मतदान अधिकारियों की व्यवस्था नहीं है। मैं उन्हें यह याद दिलाना चाहता हूं कि उस समय उनकी क्या स्थिति होगी, जब उन्हें यह बताया जाए कि उनके साथ किसी व्यक्ति ने अन्याय किया है और यदि वे अपना मामला न्यायालय में ले जाएं, तो उन्हें निश्चय ही सफलता मिलेगी, लेकिन उन्हें न्याय इसलिए नहीं मिल पाया कि उच्च न्यायालय में न्यायाधीशों की संख्या पर्याप्त नहीं थी। यह स्थिति उन्हें कैसी लगेगी? जाहिर है, यदि मताधिकार जन्मजात अधिकार है और यदि उस मताधिकार को व्यावहारिक रूप देने में कुछ प्रशासनिक कठिनाइयां हैं, इसका इलाज यह तो नहीं हो सकता कि मताधिकार दिया ही न जाए। बल्कि होना तो यह चाहिए कि उसके लिए आवश्यक तंत्र की व्यवस्था की जाए, जिससे कि प्रत्येक पुरुष या स्त्री, जो उस मताधिकार से लाभान्वित होने के पात्र हैं, उसे कार्यरूप प्रदान कर सकें।
महोदय! मुझे लगता है कि मताधिकार देने में, जो कठिनाइयां पैदा होती हैं और जिनकी ओर हमारा ध्यान आकर्षित किया गया है, उनके दो भिन्न स्रोत हैं। हमें बताया