उप-समिति संख्या 6
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गया है कि भारत के निर्वाचन-क्षेत्र बहुत विस्तृत हैं और जैसा कि साइमन कमीशन की रिपोर्ट से जाहिर होता है, उनका स्वरूप बहुत ही विस्मयकारी है। कहा जाता है कि इस समय विद्यमान निर्वाचन-क्षेत्रों में यदि निर्वाचकों की संख्या बढ़ा दी जाए, तो समूचा व्यवस्था-तंत्र भरभरा कर औंधे मुंह गिर पड़े। मेरा इस सम्मेलन से एक ही निवेदन है कि इस कठिनाई को तो आसानी से दूर किया जा सकता है और मेरी दृष्टि में उसका यही तरीका हो सकता है। मेरे विचार में इस कठिनाई का बड़ा कारण आपकी वर्तमान विधान परिषदों की रचना और संख्या है। वह रचना इतनी ज्यादा सीमित है कि आपके पास इतने बड़े-बड़े निर्वाचन-क्षेत्र रखने के अलावा कोई विकल्प ही नहीं है। मुझे लगता है कि संख्या की दृष्टि से प्रांतों में विधान-मंडलों के सदस्यों की वर्तमान संख्या हास्यास्पद है। तनिक उन आंकड़ों की ओर ध्यान दें। तुलनात्मक दृष्टि से देखा जाए, तो मद्रास, बंगाल और संयुक्त प्रांत की जनसंख्या कमोवेश वही है, जो फ्रांस, ग्रेट ब्रिटेन और इटली की है। मद्रास की विधान परिषद में 132 सदस्य हैं, बंगाल की विधान परिषद में 140 सदस्य हैं, संयुक्त प्रांत की विधान परिषद में 123 सदस्य हैं। इसके विपरीत फ्रांस के अवर सदन में 626 सदस्य हैं, ग्रेट ब्रिटेन में लगभग 600 से अधिक हैं और इटली में 560 सदस्य हैं। दूसरी ओर बंबई और पंजाब को लें, जो जनसंख्या के मामले में कमोवेश एक जैसे ही हैं। बंबई में 114 सदस्य हैं। पंजाब में 94 हैं। बंबई और पंजाब की जनसंख्या कमोवेश स्पेन के बराबर है, यदि आप स्पेन के अवर सदन को ही लें, तो आप देखेंगे कि उसमें 417 सदस्य हैं। मैं जानता हूं कि अब उसका अस्तित्व नहीं है, लेकिन वह दूसरी बात है। यहां मामला संविधान का है। फ्रांस में यह मौजूद है, जहां इसमें सदस्यों की भारी संख्या है। इसके बाद मध्य प्रांत को ही लें, जहां की विधान परिषद में 73 सदस्य हैं। मुझे विदित है कि मध्य प्रांत की जनसंख्या यूगोस्लाविय की जनसंख्या के बराबर है। यूगोस्लाविया में 313 सदस्य हैं। असम में 73 सदस्य हैं, जबकि जनसंख्या में वह पुर्तगाल के बराबर है और पुर्तगाल में 146 सदस्य हैं।
अब जाहिर है कि यदि आप लोगों की इतनी भारी संख्या में लोगों को विधान परिषदों में, जिनमें सदस्यों की संख्या 140 से अधिक नहीं है, भरना चाहेंगे तो इसका यह परिणाम होगा कि आपको बहुत बड़े निर्वाचन-क्षेत्र बनाने पड़ेंगे। आप विधान परिषदों में सदस्यों की संख्या बढ़ाने से क्यों डरते हैं? यदि आप उससे न डरें और दूसरे देशों का इस संबंध में अनुसरण करें, तो आप निश्चय ही निर्वाचन-क्षेत्रों का आकार आसानी से कम कर सकेंगे और ऐसा करके उन कठिनाइयों में से एक पर विजय पा सकेंगे, जो वयस्क मताधिकार को लेकर आ खड़ी हुई हैं।
दूसरी कठिनाई जिसकी ओर संकेत किया गया था, वह यह थी कि हमारे पास पर्याप्त संख्या में मतदान अधिकारी नहीं हैं। मेरी दृष्टि में यह कठिनाई भी कोई बहुत गंभीर नहीं है। मेरा ख्याल है कि यदि भारत में जितने भी कॉलेज छात्र हैं, उन्हें निर्वाचन