5. उप-समिति संख्या 6 (मताधिकार) - Page 83

66 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

विभागों में नौकरी दे दी जाए, तो यह कठिनाई बहुत आसानी से दूर की जा सकती है। मेरे विपक्ष में बैठे कुछ मित्र इस पर हंस रहे हैं, लेकिन इसमें हंसने की कोई बात मेरी समझ में तो आती नहीं। मैं जानता हूं और यह एक तथ्य है कि जनगणना के समय कॉलेज और स्कूल के सभी विद्यार्थी गणना करने में जनगणना विभाग की सहायता करते हैं। उदाहरण के लिए यदि चुनाव के दिन यही प्रणाली अपना ली जाए, सभी छात्रों से इस काम में सहायता के लिए कहा जाए और मुझे इसमें लेशमात्र संदेह नहीं है कि वे विभाग की सहायता के लिए आगे आएंगे, तो हमें निश्चित रूप से इससे कहीं अधिक मतदान अधिकारी मिल जाएंगे, जितनों की ऐसे अवसरों पर आवश्यकता पड़ती है।

अतः मैं समझता हूं कि वर्तमान स्थिति में जो कठिनाइयां हैं, वे दुरुस्त नहीं हैं। यह मैं विपक्ष में बैठे अपने उन मित्रों को बता रहा हूं, जिन्हें इसी कारण से वयस्क मताधिकार पर आपत्ति है। उन्होंने जो रुख अपनाया है, वह मुझे कुछ अजीब सा लगता है। जब ब्रिटिश शिष्टमंडल का कोई सदस्य कोई कठिनाई उठाते हुए यह कहता है कि भारत के रास्ते में अनेक कठिनाइयां हैं और इसलिए भारत को डोमियन स्टेटस दर्जा या उत्तरदायी सरकार नहीं मिलनी चाहिए, तो जो सज्जन मेरे सामने बैठे हैं, उन अंग्रेज महाशय को, उन कठिनाइयों को अनुचित लाभ नहीं उठाने देंगे और तत्काल उन्हें झिड़क देंगे, ‘आप हमारे दावों को दबाने के लिए कठिनाइयों की दुहाई क्यों देते हैं? ये ऐसी कठिनाइयां नहीं कि जिनका सामना न किया जा सके।’ मैं भी उन महाशय से यही कहना चाहता हूं कि हम जो इस पक्ष में बैठे हैं, आपको इस कठिनाई का लाभ नहीं उठाने देंगे। हम तो कहते हैं कि अगर हमारे हाथों में सत्ता देने के मार्ग में कुछ कठिनाइयां हैं, भी तो उनका हल तलाश किया जाए। हम आपको स्थिति का अनुचित लाभ कदापि नहीं उठाने देंगे।

महोदय! अब तक मैं उन दलीलों पर बहस कर रहा था, जो वयस्क मताधिकार के विरोध में पेश की गई हैं। अब मैं एक-दो ऐसे तर्क प्रस्तुत करना चाहता हूं, जो मेरी राय में वयस्क मताधिकार के पक्ष में हैं और जिन्हें मैं समझता हूं कि वे कमोवेश निर्णायक हैं। पहला तर्क जो मैं आपके समक्ष रखना चाहता हूं वह यह है कि आप भारत में ऐसी कोई मताधिकार प्रणाली नहीं ला सकते, जो वयस्क मताधिकार से किसी भी तरह कम हो, जिसमें भारत की सभी जातियों और संप्रदायों को समान प्रतिनिधित्व न दिया गया हो। भारत के लिए आप किसी ऐसी अन्य प्रणाली की कल्पना भी नहीं कर सकते, जिसकी यही परिणति हो। उदाहरण के लिए निर्वाचन-क्षेत्रों को ही लें। बंगाल और पंजाब में मुसलमानों का बहुमत है। सिंध में भी, बंबई को छोड़कर, मुसलमान बहुसंख्यक हैं। अब देखते हैं कि इन प्रांतों में मुस्लिम समुदायों की क्या स्थिति हैं? मैं यह प्रश्न टोह लेने के लिए कर रहा हूं, मेरे मुस्लिम मित्र शायद इससे कुछ भिन्न रुख अपनाएं_ मैं इसे एक समस्या के रूप में पेश कर रहा हूं। हमारी आज की मताधिकार प्रणाली के अधीन इन प्रांतों में मुस्लिम समुदायों की क्या स्थिति है? सिंध में तो मुसलमानों की संख्या