5. उप-समिति संख्या 6 (मताधिकार) - Page 84

उप-समिति संख्या 6

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लगभग 70 प्रतिशत है, लेकिन इसके बावजूद यदि मैं गलती नहीं कर रहा हूं, तो उनमें से मतदाता केवल 49 प्रतिशत ही हैं। उदाहरण के लिए फिर तनिक बंगाल और पंजाब की ओर मुड़ें, वहां भी मुसलमानों की संख्या अधिक है और फिर भी मतदाता सूची में वे अल्पमत हैं। दलित वर्गों पर फिर से विचार कर लिया जाए। वर्तमान मताधिकार प्रणाली में वे निर्वाचन-मंडल में कहीं भी नहीं हैं।

मैं समझता हूं कि इस प्रकार की मताधिकार प्रणाली अत्यंत अपमानजनक है। आपको एक बात याद रखनी चाहिए कि भारतीय समाज की रचना कई जातियों और मतों के लोगों से हुई है और वे जातियां और धर्म एक दूसरे के साथ उध्वार्धर लंब के रूप में जुड़े हुए नहीं हैं, जिससे कि यदि आप इस पिंड को किसी भी बिंदु पर काटें तो, आपको वह भाग मिलेगा, जो सभी समुदायों का समान रूप से प्रतिनिधि है। इसके विपरीत यदि मुझे ऐसा कहने की अनुमति हो कि वे इस प्रकार जुड़े हुए हैं कि उनके समानांतर लाभ क्षैतिज रूप में एक-दूसरे के ऊपर रखे हुए हैं, ताकि यदि आप किसी भी बिंदु पर उसे काटें, तो आपके हाथ वह भाग आएगा, जो केवल एक ही समुदाय और अधिकाधिक दो का प्रतिनिधि होगा और शेष को कोई भी प्रतिनिधित्व नहीं होगा। स्पष्ट है कि आप राजनीतिक नहीं प्रशासन की कोई ऐसी प्रणाली शुरू करना चाहते हैं, जिसमें केवल कुछ जातियों या गिने-चुने समुदायों की ही प्रधानता हो। यह भी निश्चित है कि आप भारत में दक्षिण अफ्रीका जैसी व्यवस्था शुरू करना चाहते, जहां केवल कुछ लोगों को मताधिकार दिया जाए और शेष को उससे वंचित कर दिया जाए। मैं तो यह कहना चाहता हूं कि यदि आप प्रत्येक व्यक्ति को मताधिकार देने में दिलचस्पी रखते हैं, प्रत्येक व्यक्ति को राजनीतिक मताधिकार देना चाहते हैं, ताकि वह अपना भाग्य स्वयं बना सके, तो आप भारत में वयस्क मताधिकार के अलावा मताधिकार की कोई दूसरी प्रणाली नहीं ला सकते।

मैं आपको एक और उदाहरण देता हूं। मैं यह निवेदन करूं कि मैं नारी मताधिकार का विरोधी नहीं हूं और मैं अपनी महिला सहकर्मी श्रीमती सुब्बरायन का बहुत आभारी हूं कि उन्होंने इस मामले में हमारा समर्थन किया है। मैं जी-जान से उनके साथ हूं। मैं यहां एक-दो उदाहरण देकर यह बताना चाहता हूं कि मताधिकार को बढ़ाने और उसे व्यापक रूप प्रदान करने के लिए कौन-कौन से सुझाव दिए गए हैं। यह सुझाव दिया गया है कि देश में साक्षर मताधिकार होना चाहिए। मैं इसे विचित्र मताधिकार तो नहीं कहूंगा, अलबत्ता इसके प्रभाव से आपको अवगत अवश्य करना चाहूंगा। इसका प्रभाव यह होगा कि कुछ समुदायों के मतदाताओं की संख्या तो दुगनी हो जाएगी, जबकि दूसरे समुदाय जहां हैं, वहीं बने रहेंगे। साक्षरता का भारत में ऐसा असमान वितरण है कि कुछ समुदायों के मताधिकार में तो भारी वृद्धि हो जाएगी, जबकि दूसरे समुदायों की स्थिति यथावत् बनी रहेगी। मुझे पूर्ण विश्वास है कि आप ऐसी स्थिति पैदा नहीं होने देंगे।