68 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
इसलिए मेरा यह अनुरोध है कि यदि यह सम्मेलन और इस मेज के इर्द-गिर्द, जो सदस्य बैठे हैं, वे अपने विश्वास के प्रति सच्चे हैं, यह धारणा रखते हैं कि भारत को उत्तरदायी सरकार का अधिकार मिलना चाहिए और शासन को जनता के प्रति उत्तरदायी होना चाहिए, तो मेरा विनम्र निवेदन है कि वयस्क मताधिकार का कोई विकल्प है ही नहीं।
महोदय! एक और तर्क है, जिसे मैं पेश करना चाहता हूं और मेरी दृष्टि में वह इस मामले में सबसे अधिक निर्णायक तर्क है। हम सभी यह जानते हैं कि निर्वाचक-मंडल संयुक्त हो या पृथक, यह बड़ा जटिल प्रश्न है और मैं समझता हूं कि यह बहुत महत्वपूर्ण प्रश्न है। मैं इस सम्मेलन को यह बताना चाहता हूं कि मेरी राय में संयुक्त बनाम पृथक निर्वाचक-मंडल का प्रश्न मताधिकार के प्रश्न से अभिन्न रूप से जुड़ा हुआ है। आप भारत में किसी भी अल्पसंख्यक समुदाय से नहीं पूछेंगे, आप भारत में किसी अल्पसंख्यक समुदाय पर दबाव नहीं डालेंगे और आपको भारत के किसी भी अल्पसंख्यक समुदाय से इस प्रश्न पर सहमति नहीं मिलेगी कि वह संयुक्त निर्वाचक-मंडल के प्रस्ताव से सहमत हो जाए, जब तक कि उस अल्पसंख्यक समुदाय को आप वयस्क मताधिकार न दे दें। जब तक मुझे यह विश्वास न हो जाएगा कि मुझे चुनावों में निर्वाचन की वही शक्ति मिलेगी, जो मेरी सामाजिक शक्ति के अनुरूप है, तब तक मैं बहुमत की किसी भी सरकार का नियंत्रण या प्राधिकार मानने के लिए तैयार नहीं हूं।। जब तक मुझे यह पता नहीं चलता कि दलित वर्गों के समुदाय के प्रत्येक पुरुष को अपने मताधिकार का प्रयोग करने तथा उस प्रत्याशी के उद्देश्य और लक्ष्य निर्धारित करने का अवसर नहीं दिया जाएगा, जो देश की विशाल जनता का प्रतिनिधित्व करने जाता है, तब तक मैं निश्चयपूर्वक संयुक्त निर्वाचक-मंडल से सहमति व्यक्त नहीं करूंगा, कभी भी नहीं। मैं अपने आपको अल्पसंख्यकों की स्थिति में नहीं रखना चाहता, न ही मैं बहुसंख्यकों को अपना प्रत्याशी चुनने की अनुमति दूंगा। जी नहीं, ऐसा कदापि नहीं हो सकता। मेरा यह भी विचार है कि जो कुछ मेरे समुदाय के अल्पसंख्यकों के लिए सच है, वही मुसलमानों के लिए भी सच होगा। मैं यहां कोई ऐसी बात कहना नहीं चाहता, जो मुझे दूसरी समिति में कहनी है, लेकिन यह बात इतनी प्रासंगिक है कि मैं इसका उल्लेख किए बिना नहीं रह सकता। आपके लिए बंगाल या पंजाब के मुसलमानों के संयुक्त निर्वाचक-मंडल का प्रस्ताव स्वीकार करने के लिए कहना भी उतना ही अनुचित होगा, यदि आप निर्वाचक-मंडल में उन्हें बहुमत का दर्जा न दें। आप मुसलमानों को मताधिकार देने से वंचित करके उन्हें निर्वाचन शक्ति में अल्पमत का दर्जा दें और फिर कहें, ‘आइए, संयुक्त निर्वाचक-मंडल स्वीकार कीजिए’ तो यह संभव नहीं हो सकता।
इस तथ्य की निर्णायकता नेहरू समिति और भारतीय केंद्रीय समिति के तीन सदस्यों ने स्वीकार की थी।