70 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
को व्यापक बनाया जाए। यह वयस्क जनता के 25 प्रतिशत के आधार पर किया जाए और यह ग्रामीण तथा शहरी क्षेत्रों में परोक्ष चुनाव प्रणाली द्वारा अपने प्रतिनिधियों का चुनाव करें। मैं इन दोनों में कोई अंतर नहीं करता। इससे औद्योगिक और कृषि मजदूर, दोनों शामिल हो सकेंगे।
डॉ. अम्बेडकरः इसमें कोई शामिल नहीं होगा।
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डॉ. अम्बेडकरऽः महोदय! आज सवेरे मैंने मताधिकार के प्रश्न पर जो कुछ कहना आवश्यक था, वह कह दिया था। लेकिन सवेरे मैंने जो कुछ कहा, उसमें कोई परिवर्तन किए बिना मैं उन सुझावों की पड़ताल करना चाहता हूं, जो मताधिकार को विस्तृत बनाने के उद्देश्य से इस समिति के समक्ष प्रस्तुत किए गए थे। मेरा ख्याल है कि समिति में इस बात पर सहमति है कि वयस्क मताधिकार ही श्रेष्ठ है। हममें से कुछ का विचार है कि इसे तत्काल अपना लिया जाए, जबकि हमारे शेष मित्र चाहते हैं कि इसे चरणबद्ध ढंग से लागू किया जाए। इस संबंध में हमारे सामने दो ठोस सुझाव हैं। एक सुझाव तो यह है कि हमें किस्त पद्धति अपनानी चाहिए और कुछ वर्षों के अंतराल पर मतदाता-सूची में 25 प्रतिशत वृद्धि करते रहना चाहिए, ताकि मताधिकार और व्यापक होता जाए। दूसरी ओर हमारे मित्र नोबल मार्कवेस ऑफ जैटलैंड का सुझाव हमारे समक्ष है, जिसमें वयस्क मताधिकार के आदर्श की प्राप्ति पर बल दिया गया है।
इन दोनों सुझावों की तुलना करते हुए मैं यह कहे बिना नहीं रह सकता कि मैं नोबल लॉर्ड का पक्षधर हूं, हालांकि जैसा कि मैं कह चुका हूं, मेरा यह दृढ़ विचार है कि हमें ऐसा वयस्क मताधिकार चाहिए, जिसमें कोई काट-छांट न की गई हो। यदि इन दोनों में केवल विकल्प का प्रश्न होता है, तो निश्चित रूप से ऐसी प्रणाली को पसंद करता, जो उस प्रणाली के बजाए जो जनता के केवल एक वर्ग को तो औना-पौना मताधिकार देती और विशाल जनसमुदाय को स्वशासन का अधिकार देने का निर्णय किसी और समय के लिए टाल देती, उस प्रणाली को वरीयता देता, जो तत्काल वयस्क मताधिकार की आधारशिला रखने का संकल्प करती। लेकिन यह कहने के बाद भी मैं उस सुझाव का पूरे मन से समर्थन नहीं कर सकता, क्योंकि मुझे इसमें कुछ कठिनाइयां दिखाई देती हैं। लेकिन चूंकि मेरा विचार है कि नोबल मार्कवेस हमारी उन कठिनाइयों को, जो हम अनुभव कर रहे हैं, दूर करने में हमारी सहायता को आएंगे, इसलिए मैं एक-दो बातें कहना चाहता हूं। एक तो यह कि यदि समूहों द्वारा निर्वाचन की यह प्रणाली अपना ली जाती है, तो मुझे लगता है कि ऐसी प्रणाली से दलित वर्गों को शायद कुछ विशेष लाभ नहीं पहुंचेगा। मेरे इस कथन का यह कारण है कि दलित वर्ग सारे भारत में फैले हुए हैं और हर गांव में उनकी संख्या थोड़ी ही है, उनके जीवन पर लगभग सभी ओर
ऽ प्रोसीडिंग्स ऑफ दि सब-कमेटी नं. 6 (फ्रेन्चाइज), पृ. 72-73