72 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
डॉ. अम्बेडकरः मैं आपके संक्षेपण के पहले पैरा के संबंध में अपने विचार व्यक्त करना चाहता हूं। मैं चाहता हूं कि आपने जो पैरा तैयार किया है, उसमें यह उल्लेख भी कर दिया जाए कि समिति की यह राय थी कि प्रशासन तथा तंत्र के मद्देनजर मताधिकार के विस्तार को सीमित कर देना चाहिए। हमारी दृष्टि में तो यही एकमात्र परिसीमन था।
माननीय सी. सीतलवाडः यह केवल प्रशासन की ही बात नहीं है, इसमें कुछ अन्य कारण भी हैं।
श्रीमती सुब्बरायनः व्यावहारिक क्या है?
डॉ. अम्बेडकरः व्यावहारिक से तात्पर्य तंत्र है। मेरा कहने का मतलब है कि समिति में यह निर्णय हो सकता है कि वर्तमान तंत्र को देखते हुए 50 प्रतिशत लोगों को ही मताधिकार दिया जाना चाहिए।
श्री जफरुल्ला खांः आपका मतलब कुल जनसंख्या का 50 प्रतिशत है?
डॉ. अम्बेडकरः जी हां।
श्री जफरुल्ला खां ः वह तो सार्वजनिक वयस्क मताधिकार से कुछ ज्यादा ही होगा।
अध्यक्षः यह सुझाव दिया जाता है कि हमें अधिकतम को निकाल देना चाहिए। सारा मामला विशेष समिति पर निर्भर है कि वह उसे व्यवहार्य और वांछनीय समझती है या नहीं, इसलिए अधिकतम पर बल देने की आवश्यकता को छोड़ ही दिया जाए। क्या आपमें से कोई यह चाहते हैं कि इसे मैं दुबारा पढ़कर सुनाऊं?
श्री के.टी. पालः यदि आप 25 प्रतिशत इसलिए निकाल देना चाहते हैं कि इससे हमारा बयान कमजोर पड़ जाए, तो मैं इससे सहमत नहीं हूं।
अध्यक्षः इससे वह कमजोर नहीं पड़ता।
श्री चिंतामणिः ऐसे मामलों में प्रायः यह देखा गया है कि जब न्यूनतम की बात की जाए, तो व्यावहारिक रूप में वह अधिकतम ही हो जाता है। यदि हम अपनी रिपोर्ट में 10 प्रतिशत की संख्या का निर्देश करें, तो उससे गठित मताधिकार समिति यही समझेगी कि यदि वे हमें अधिकाधिक दस प्रतिशत भी दिला दें तो हम संतुष्ट हो जाएंगे। हममें से जिन्होंने 25 प्रतिशत की संख्या का उल्लेख किया है, वह तो वर्तमान स्थिति और वयस्क मताधिकार के बीच एक प्रकार के असंतोषप्रद समझौते के रूप में ही किया है। यदि आप इसे निकाल दें, तो मुझे उससे खुशी नहीं होगी।
श्री फुटः श्री चिंतामणि ने वयस्क जनता का 25 प्रतिशत बताया है न?
श्री चिंतामणिः कुल जनता का।
श्री फुटः क्षमा कीजिए।
श्री जोशीः महोदय! मुझे यह कहते हुए खेद है कि आप रिपोर्ट में यह न लिखें कि