74 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
मताधिकार समिति को ऐसी शर्तें पेश करनी चाहिए, जिनसे यथासंभव यह सुनिश्चित किया जा सके कि विभिन्न समुदायों में मतदाताओं और जनता में वही अनुपात बना रहे। यह प्रस्ताव साइमन कमीशन ने रखा था और इसका कई स्थानीय सरकारों ने समर्थन भी किया है। क्या उसे नया प्रस्ताव माना जा सकता है? यदि मताधिकार समिति उसे संभाव्य न माने, तो वह अस्वीकार कर देगी।
अध्यक्षः मेरा ख्याल है कि यह अगले शीर्ष के अंतर्गत आता है, यानि ‘मताधिकार का सामान्य आधार। ( i ) क्या मताधिकार संबंधी योग्यताएं एक ही क्षेत्र में सभी समुदायों के लिए समान हों?’ मैं आपका ध्यान ‘एक ही क्षेत्र में’ की ओर आकर्षित करना चाहता हूं। फिलहाल हमें नारी मताधिकार या उसी प्रकार के अन्य विषय नहीं उठाने चाहिए।
माननीय पी.सी. मित्तरः आपने जो व्यवस्था दी, उससे मुझे लगा कि विशेष हित और सामुदायिक हित अल्पसंख्यक समिति के अंतर्गत आते हैं।
अध्यक्षः हमें उसके संबंध में कल के बाद और कुछ जानकारी मिलेगी। इस समय तो हम मताधिकार के सामान्य आधार पर चर्चा कर रहे हैं और यह भी जानना चाहते हैं कि सभी समुदायों के लिए समान अर्हताएं रखी जाएं या नहीं।
दीवान बहादुर रामचंद्र रावः आपने कहा था कि आप प्रधानमंत्री से बात करके हमें बताएंगे कि यह मामला हमारी समिति के अधिकार क्षेत्र में आता है या किसी दूसरी के।
डॉ. अम्बेडकरः मैं एक प्रस्ताव रखना चाहता हूं हालांकि सार्वजनिक वयस्क मताधिकार के बारे में इस समिति के कुछ सदस्यों ने यह बताया है कि यह फिलहाल न संभव है और न ही व्यावहारिक, लेकिन मेरा विचार है कि इस समय दलित वर्गों के लिए वयस्क मताधिकार का प्रश्न, तो विचारार्थ उठाया ही जा सकता है। उदाहरण के लिए इस मत का कोई औचित्य नहीं है कि सभी समुदायों के लिए एक ही प्रकार का मताधिकार हो, बल्कि सच तो यह है कि ऐसे भी मामले होंगे, जो हम जीवन के व्यावहारिक विषयों में देखते हैं कि हैसियत में समानता प्रज्ञाप्त करने के लिए हमें असमानता के तरीके अपनाने पड़ते हैं। उदाहरण के लिए अधिक धनवान या तुलना में अधिक निर्धन वर्ग के साथ व्यवहार के मामले में हम बाद वाले के साथ कुछ विशेष रियायत बरतते हैं। हम धनी वर्ग पर निर्धन की अपेक्षा ऊंची दी पर कर लगाते हैं और इसका मंतव्य यही होता है कि कर अदा करने की योग्यता के सिद्धांत को व्यावहारिक रूप प्रदान किया जाए। मैं समझता हूं कि यही सिद्धांत दलित वर्गों पर भी लागू किया जाए। यदि समिति का यही उद्देश्य है कि निर्वाचक-मंडल में सभी समुदायों का प्रतिनिधित्व समान अनुपात में होना चाहिए, तो कोई कारण नहीं है कि एक वर्ग के लोगों के साथ दूसरे वर्ग के लोगों से भिन्न व्यवहार न किया जाए, यदि भिन्न प्रकार का व्यवहार ही उस उद्देश्य की पूर्ति के लिए एकमात्र साधन हो। मुझे लगता है कि यदि उदाहरण के लिए वयस्क मताधिकार दलित वर्ग पर ही लागू होता, दूसरे समुदायों पर नहीं लेकिन दूसरे समुदायों की अपनी प्रणाली थी, जैसा कि लॉर्ड जैटलैंड ने संकेत दिया है - तो वास्तव में इसे अन्तर कहा ही नहीं जा सकता और