80 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
वह यह है कि दूसरी धारा की पंक्ति 2 में ‘यह किस सीमा’ शब्दों के पहले ‘वर्तमान परिस्थितियों में उपलब्ध निर्वाचन तंत्र के साथ’ जोड़ दिया जाए। तब यह यों पढ़ा जाएगा - ‘इस बात पर कुछ मतभेद था कि वर्तमान परिस्थितियों में यह किस सीमा तक व्यवहार्य होगा।’
अनेक सदस्यः अन्य कारण भी तो हैं।
डॉ. अम्बेडकरः यह मेरा संशोधन है। मैं यह अध्यक्ष महोदय पर छोड़ता हूं, क्योंकि समिति का जो अभिप्राय है वह उसे बेहतर ढंग से समझते हैं। लेकिन मेरे मस्तिष्क पर, जो प्रभाव पड़ा, वह यह था कि उन लोगों में से अधिसंख्य जिन्होंने सार्वजनिक वयस्क मताधिकार को आसान भविष्य के लिए व्यावहारिक राजनीति समझ कर उसका विरोध किया था कि भारत में पर्याप्त निर्वाचन तंत्र का अभाव है, जो ऐसी स्थिति में निपटने के योग्य हो जिसमें प्रत्येक व्यक्ति को मत देने का अधिकार दिया गया हो।
अध्यक्षः अब, डॉ. अम्बेडकर, मेरा अपना यह विचार है कि यही एकमात्र कारण नहीं था, जिस पर मामले की बुनियाद रखी गई हो। हां, यह मुख्य कारणों में से एक अवश्य था। लेकिन समिति के मत को अभिलिखित करते हुए मैं नहीं समझता कि हमें इतना ही कहकर रह जाना चाहिए कि वही एकमात्र कारण था। उदाहरण के लिए संचार संबंधी कठिनाइयों और यात्रा आदि की सुविधाओं का अभाव और उसी प्रकार के अन्य कारणों पर भी बल दिया गया था।
डॉ. अम्बेडकरः मैं तो यह चाहता हूं कि इसे रिपोर्ट में भी स्पष्ट रूप से कह दिया जाए।
श्री जोशीः आप यही बात कुछ इस प्रकार भी कह सकते हैं कि यह ‘निर्वाचन संबंधी व्यावहारिक कठिनाइयों के कारण है’।
माननीय कावसजी जहांगीरः लेकिन इस पर कुछ और आपत्तियां भी हैं।
श्री जोशीः हम सामान्य बहुमत की बात कर रहे हैं, उन लोगों की नहीं, जो सिद्धांत रूप में मत नहीं देना चाहते।
अध्यक्षः मेरा विचार है कि जो कुछ पहले ही कहा जा चुका है, उसी से बात स्पष्ट हो जाती है। आखिर आपकी और श्री जोशी की बात टिप्पणी के अंत में आ जाती है।
डॉ. अम्बेडकरः जी हां, वह तो मैं समझ रहा हूं। हालांकि हम चाहते तो यही हैं कि आदर्श व्यवस्था हो जाए, लेकिन यह भी लगता है कि हमें दूसरे विकल्प पर ही सहमत होना पड़े, लेकिन हम चाहते हैं कि वह विकल्प जितना अच्छा बन सके, बनाया जाए। मैं समझता हूं मेरी बात बिल्कुल स्पष्ट हो जानी चाहिए, ताकि विशेष मताधिकार
ऽ प्रोसीडिंग्स ऑफ दि सब-कमेटी नं. 6 (फ्रेन्चाइज), पृ. 152-54