82 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
सकते। व्यवहार्य और वांछनीय अनयोन्याश्रित नहीं है और आपने ऐसे ही लचीले शब्द का प्रयोग किया है। मेरी राय में यदि दोनों शब्दों को वहां रख दिया जाए, तो बेहतर होगा। हमने शुरू में ही यह कहकर अपना मत स्पष्ट कर दिया है कि हम वयस्क मताधिकार को एक आदर्श मानते हैं और उसकी कामना करते हैं।
* * * *
अध्यक्षऽः अच्छा हो, यदि इस पर पंक्तिवार चर्चा करें। यदि कोई संशोधन पेश हो, तो कोई सज्जन टोकेंगे तो नहींः ‘हम सिफारिश करते हैं कि आयोग को इस वृद्धि की व्यवस्था के अलावा इस योजना के समावेश पर भी विचार करना चाहिए, जिसके अनुसार उन सभी वयस्कों को, जो प्रत्यक्ष मत के पात्र नहीं हैं 20-20 के प्राथमिक वर्गों में एकत्र कर लिया जाए’, और उसके पहले इन शब्दों के समावेश का प्रस्ताव किया जाता है, ‘या किसी अन्य उपयुक्त ढंग से’।
क्या इस पर कोई आपत्ति है?
‘ताकि प्रत्येक वर्ग से एक प्रतिनिधि सदस्य का चुनाव किया जा सके, जिसे या तो उन्हीं निर्वाचन क्षेत्रों में प्रत्यक्षः अर्ह मतदाताओं या उनके लिए निर्मित पृथक निर्वाचन-क्षेत्रों में प्रांतीय निर्वाचनों में मतदान करने की पात्रता प्राप्त हो।’
‘(श्री जोशी, श्री शिवा राव, डॉ. अम्बेडकर और श्री श्रीनिवासन इन प्रस्तावों को केवल ‘दूसरा सबसे अच्छा विकल्प’ मानते हैं ओर उनका विचार है कि वयस्क मताधिकार का प्रवर्तन व्यवहार्य और वांछनीय, दोनों है)।’
डॉ. अम्बेडकरः मैं यह कहना चाहता हूं कि श्री के.टी. पाल की भी वही राय है, जो मेरी है।
अध्यक्षः इसे नोट किया जाएगा।
श्री जोशीः मेरा प्रस्ताव है कि ‘दूसरा सबसे अच्छा विकल्प’ के स्थान पर ‘सर्वथा अपर्याप्त’ शब्द रख दिए जाएं।
अध्यक्षः यह तो वास्तव में आप महानुभावों के सोचने की बात है। यदि आप ‘दूसरा अच्छा विकल्प’ के स्थान पर ‘सर्वथा अपर्याप्त’ रखना चाहते हैं, तो यह आपकी इच्छा पर निर्भर है। अतः प्रस्ताव यों पढ़ा जाएगाः ‘श्री जोशी, श्री शिवा राव, डॉ. अम्बेडकर, श्री श्रीनिवासन और श्री के.टी. पाल इन प्रस्तावों को सर्वथा अपर्याप्त मानते हैं और उनका मत है कि वयस्क मताधिकार का प्रवर्तन व्यवहार्य भी है और वांछनीय भी।’
श्री जाधवः इस सूची में मेरा नाम भी लिख लीजिए।
अध्यक्षः इसे नोट कर लिया जाएगा। आगे यह लिखा जाएगा, ‘माननीय कावसजी जहांगीर, पी.सी. मित्तर और श्री बसु हमारे सुझाए गए न्यूनतम या अधिकतम से सहमत नहीं हैं, बल्कि वे चाहते हैं कि मताधिकार आयोग का विवेकाधिकार सर्वथा स्वच्छंद होना चाहिए।’ जाहिर है कि यह मामला ऐसा है, जिस पर वे जो चाहें कह सकते हैं।
ऽ प्रोसीडिंग्स ऑफ दि सब-कमेटी नं. 6 (फ्रेन्चाइज), पृ. 159