1. हिंदुत्व का दर्शन - Page 101

86 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

10.123 शूद्र के लिए, ब्राह्मण की सेवा करना, केवल यही सर्वोत्तम व्यवसाय

है, क्योंकि इसके अलावा वह जो कुछ भी करता है, उससे कोई फल की

प्राप्ति नहीं हो सकती।

मनु और आगे कहता हैः

10.129 शूद्र संचय करने की स्थिति में हो, फिर भी ऐसा न करे, क्योंकि

जो शूद्र धन संचय करता है, वह ब्राह्मण को दुख पहुंचाता है।

मनु के उपरोक्त विधानों से हिंदू धर्म के दर्शन का सही रूप स्पष्ट होता है। हिंदू धर्म महामानव (ब्राह्मण) का धर्म है और वह यह उपदेश देता है कि जो बात महामानव के लिए उचित है, वहीं नैतिक दृष्टि से सही और उचित है।

क्या इसके समानांतर कोई और भी दर्शन है? उसे बताते हुए भी मुझे घृणा आती है। परंतु बात बिल्कुल स्पष्ट है। हिंदू धर्म के दर्शन का समानांतर केवल तीत्शे में ही मिलता है। इस सुझाव पर हिंदू क्रोधित हो सकते हैं। वह सर्वथा स्वाभाविक है क्योंकि नीत्शे के दर्शन की भारी उपेक्षा की जाती है। वह कभी पनपा नहीं। उसके अपने ही शब्दों में उसे कभी बड़े-बड़े अमीरों, सामंतों का दार्शनिक कहा गया, तो कभी उसे दुत्कार दिया गया। कभी-कभी उस पर दया की गई और कभी-कभी अमानवीय मानकर उसकी उपेक्षा की गई। नीत्शे के दर्शन की पहचान सत्ता की लालसा, हिंसाचार, नैतिक मूल्यों का नकार, महामानव और उसके लिए त्याग, गुलामी और सामान्य मनुष्य की अधोगति, इन बातों के साथ ही की जाने लगी। उसके दर्शन ने इन कुछ मुख्य बातों के कारण उसकी अपनी पीढ़ी के लोगों के मल में ही घिनौनेपन की भावना तथा आतंक का निर्माण किया। उसकी भारी उपेक्षा की गई, यद्यपि उसे बहिष्कृत न भी किया गया हो और स्वयं नीत्शे ने अपने-आपको मरणोपरांत सम्मानित व्यक्तियों की सूची में समावेश करके राहत महसूस की। उसने अपने स्वयं के लिए अपने समय से आगे अनेक सदियों बाद एक ऐसे समाज की कल्पना की जो शायद उसकी प्रशंसा करें। लेकिन इस बात में भी उसे निराशा सहनी पड़ी। उसके दर्शन की प्रशंसा होने के बजाए समय बीतने के साथ-साथ तीत्शे की पीढ़ी के लोगों के मन में जो उपेक्षा तथा डर की भावना थी, वह और भी बढ़ने लगी। ऐसा इसलिए, हुआ क्योंकि तीत्शे के दर्शन में नाजीवाद निर्माण की क्षमता है। यह बात लोगों को स्पष्ट हो गई थी। उसके मित्रों ने ही इस धारणा का तीव्र विरोध किया। परंतु यह जानना कठिन नहीं है कि उसका दर्शन किसी महामानव के निर्माण के बजाए एक महाराज्य निर्माण करने के लिए आसानी से लागू किया जा सकता है और नाजी लोगों ने वैसा ही किया। चाहे कुछ भी हो, नाजी लोक नीत्शे को अपना पूर्वज कहते हैं और उसे अपना आध्यामिक गुरू मानते हैं। हिटलर ने स्वयं नीत्शे की आवक्ष मूर्ति के साथ

  1. फ्राम नीत्शे डाउन टु हिटलर, एम. पी. निकोथस, 1938