1. हिंदुत्व का दर्शन - Page 107

92 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

जबकि मौलिक रूप से हिंदू समाज वेदों के साथ बंधा हुआ था और वह उन नियमों का पालन नहीं कर सकता था जो वेदों के विरोधी थे, इस नए नियम ने स्थिति को बदल दिया और समाज को श्रुति अथवा स्मृति का अनुसरण करने की छूट दी। परंतु बाद में इस छूट को भी वापस ले लिया गया। स्मृति का अध्ययन भी, श्रुति के समान ही अनिवार्य बना दिया गया।

यह परिवर्तन धीरे-धीरे किया गया। प्रथम स्थान पर ऐसा सूचित किया गया कि श्रुति तथा स्मृति ब्रह्मा की दो आंखें हैं और यदि उसकी एक आंख न हो, तब वह एक आंख वाला व्यक्ति बन जाता है। उसके बाद ऐसा सिद्धांत आया कि ब्रह्मणत्व, वेद तथा स्मृति दोनों के संयुक्त अध्ययन के परिणाम से ही संभव हो सकता है। अंत में ऐसा नियम आया जिसके अनुसार केवल स्मृति को मान्यता दी गई और उसकी निंदा करना पाप माना गया तथा जो व्यक्ति इसका दोषी होगा वह इक्कीस पीढि़यों तक राक्षस योनि में जन्म लेगा, ऐसा घोषित किया गया।

इस प्रकार स्मृति को हिंदू धर्म के स्रोत के रूप में मान्यता प्रदान की गई और इस बात में कोई संदेह नहीं है प्रो. अल्तेकर के अनुसारः

‘स्मृतियों ने आधुनिक हिंदू धर्म के विकास की रचना में अनेक सामाजिक

तथा धार्मिक संस्थाओं तथा प्रथाओं के पहलू निश्चित करने के कार्य में

बहुत ही महान भूमिका निभाई।’

इसलिए ऐसा नहीं कहा जा सकता है कि मैंने मनुस्मृति को हिंदू धर्म का दर्शन मानकर गलती की।

स्मृति को वेदों के स्तर तक ऊंचा उठाने का यह कार्य ब्राह्मणों द्वारा एक अत्यंत स्वार्थ के कारण किया गया था। स्मृतियों में, उसके सभी जंगली तथा विलासितापूर्ण विकास में जाति के सिद्धांत ब्राह्मणों की श्रेष्ठता, उनके अधिकार तथा विशेषाधिकारों के सिद्धांत तथा क्षत्रिय तथा वैश्यों की मातहती के सिद्धांत का तथा शूद्रों को निम्नीकरण के सिद्धांत का समावेश है। स्मृति का दर्शन इस प्रकार का होने के कारण उसे भी वही अधिकार प्रदान करने में ब्राह्मणों का प्रत्यक्ष हित था जो वेदों को दिए गए थे और जिस कार्य में अंत में उन्हें अपने हित के पक्ष में सफलता भी मिल गई। लेकिन इसके कारण संपूर्ण देश का सर्वनाश हो गया। परंतु फिर भी, जैसा कि समानता और धर्माचारी हिंदू कहते हैं, यह मानते हुए भी कि स्मृतियों में हिंदू धर्म के दर्शन का समावेश नहीं है, किन्तु उसे वेद तथा भगवतगीता से प्राप्त किया जा सकता है, यह प्रश्न रह ही जाता है कि इससे अंतिम परिणामों में क्या फर्क पड़ता है।

मुझे ऐसा प्रतीत होता है कि चाहे हम स्मृति, वेद अथवा भगवतगीता को लें,