हिंदुत्व का दर्शन
उससे इस स्थिति में कोई ज्यादा फर्क नहीं पड़ता।
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क्या वेदों की शिक्षा, स्मृति की शिक्षा से मौलिक रूप से भिन्न है? क्या भगवतगीता स्मृति के बंधनों से विपरीत है? कुछ उदाहरण इस स्थिति को स्पष्ट कर सकते हैं।
यह निर्विवाद है कि वेदों ने चातुर्वर्ण्य के सिद्धांत की रचना की है, जिसे पुरुषसूक्त नाम से जाना जाता है। यह दो मूलभूत तत्वों को मान्यता देता है उसने समाज के चार भागों में विभाजन को एक आदर्श योजना के रूप में मान्यता दी है। उसने इस बात को भी मान्यता प्रदान की है कि इन चारों भागों के संबंध असमानता के आधार पर होने चाहिएं। भगवतगीता ने जो विद्या दी है, वह भी विवाद से परे है। जो शिक्षा कृष्ण ने भगवतगीता में दी है, उसे निम्नलिखित अधिघोषण द्वारा स्ांक्षेप में बताया जा सकता हैः
4.13 मैंने स्वयं उस व्यवस्था की रचना की है, जिसे चातुर्वर्ण्य कहा जाता है
(यानी, समाज का चार जातियों, ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र में चौगुना
विभाजन) और उसके साथ ही उनकी मौलिक कार्यक्षमता के अनुसार उनके
व्यवसायों का निश्चयीकरण। चातुर्वर्ण्य का रचयिता जो है, वह मैं ही हूं।
3.35 यद्यपि दूसरे वर्ण का व्यवसाय (कर्म) अपनाना आसान हो सकता है।
परंतु व्यवसाय को उतनी कार्य-कुशलता से न कर सके। अपने ही स्वयं के
वर्ण का व्यवसाय करने में सुख है, यदि उसे करते हुए मृत्यु भी क्यों न आए,
परंतु दूसरे वर्ण का व्यवसाय अपनाना आपदा का कारण हो सकता है।
2.26.29. शिक्षित लोगों को उन अशिक्षित लोगों विश्वास को भंग नहीं
करना चाहिए, जो अपने व्यवसाय (कर्म) के साथ जुड़े हुए हैं। वे स्वयं
अपने व्यवसाय का पालन करें और तदनुसार दूसरों को भी अपने वर्णों के
व्यवसाय का पालन करने के लिए बाध्य करें। शायद, शिक्षित मनुष्य अपने
व्यवसाय के साथ जुड़े हैं, शिक्षित मनुष्य को उन्हें उनका व्यवसाय लांघकर
गलत रास्ते पर चलने के लिए भ्रष्ट नहीं करना चाहिए।
4.7.8 ‘हे अर्जुन! जब-जब कर्तव्य तथा व्यवसाय के इस धर्म का यानी
(चातुर्वर्ण्य के धर्म का) पतन होगा, तब-तब में स्वयं जन्म धारण करूंगा
और उन लोगों को जो इस पल के लिए जिम्मेदार हैं, उनको दंडित करूंगा
और इस धर्म की पूर्ण स्थापना करूंगा।’
भगवतगीता की स्थिति इस प्रकार है। तब गीता और मनुस्मृति में क्या अंतर है? संक्षेप में गीता ही मनुस्मृति है। जो मनुस्मृति से दूर भागकर गीता में शरण लेना चाहते हैं या तो वे गीता जानते ही नहीं अथवा गीता की उस आत्मा को ही, जो उसे मनुस्मृति के बहुत नजदीक लाती है, अपने विचार से हटा देना चाहते हैं।