94 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
वेद और भगवतगीता, दोनों की शिक्षा की हम मनुस्मृति की उस शिक्षा के साथ तुलना करते हैं, जो मैंने हिंदू धर्म का दर्शन स्पष्ट करने के लिए उदाहरण के रूप में की है। इन दोनों में भी क्या अंतर है? इन दोनों में केवल एक ही अंतर है, वेद तथा भगवतगीता में एक सर्वसाधारण सिद्धांत का विचार है, जब कि मनुस्मृति में उस सिद्धांत की विशेषताएं तथा अन्य विस्तारित बातों को स्पष्ट करने पर ध्यान दिया गया है। लेकिन जहां तक मनुस्मृति, वेद तथा भगवतगीता के सार के संबंध है, ये सभी एक ही नमूने पर बुने गए हैं। इन सभी के भीतर एक ही प्रकार का धागा चलता है और वास्तव में वह सभी एक ही वस्त्र के हिस्से हैं।
इसका कारण भी स्पष्ट है। ब्राह्मण, जो कि उपनिषद के अलावा लगभग संपूर्ण हिंदू धर्म साहित्य के लेखक थे, उन्होंने उनके द्वारा रचित सिद्धांतों को स्मृति, वेद तथा भगवतगीता इन सभी में अंतभूर्त करने की उत्तम सावधानी बरती। इसलिए हिंदू धर्म का दर्शन एक जैसा ही होगा, चाहे हम मनुस्मृति अथवा वेद अथवा भगवतगीता को हिंदू धर्म के उपदेश के रूप में लेते हैं।
दूसरा, ऐसा कहा जा सकता है कि मनुस्मृति कानून की एक पुस्तक है और वह नैतिक आचार-संहिता नहीं है तथा हिंदू धर्म के दर्शन के रूप में, मैंने यहां जो-कुछ भी प्रस्तुत किया है, वह केवल कानून का दर्शन है और वह हिंदू धर्म का नैतिक दर्शन नहीं है।
ऐसा मानने वाले के लिए मेरा उत्तर बहुत सरल है। मेरी यह धारणा है कि हिंदू धर्म में उसका काननन दर्शन तथा उसका नैतिक दर्शन, इन दोनों में कोई भेद नहीं है। ऐसा इसलिए है क्योंकि हिंदू धर्म में वैधानिक तथा नैतिक दोनों में भी कोई अंतर नहीं है तथा जो बात वैधानिक है, वही बात नैतिक भी है।
मेरी इस धारणा के समर्थन के लिए किसी प्रमाण की आवश्यकता नहीं है। हम ऋग्वेद के धर्म शब्द का अर्थ ख्1, लेते हैं। ‘धर्म’ शब्द ऋग्वेद में 58 बार मिलता है। उसका प्रयोग छह भिन्न-भिन्न अर्थों में किया गया है। इसका प्रयोग (1) प्राचीन तथा (2) कानून, (3) कोई भी ऐसी व्यवस्था जो समाज में कानून तथा व्यवस्था बनाए रखती है, (4) निसर्ग का मार्ग, (5) किसी पदार्थ की उत्तमता, और (6) उत्तम तथा बुरे लोगों के कर्तव्य, इन बातों को स्पष्ट करने के लिए हुआ है। इस प्रकार हम यह देख सकते हैं कि धर्म शब्द को हिंदू ‘धर्म’ में दो प्रकार के अर्थ से प्रारंभ से ही प्रयोग किया जा रहा है। यह एक कारण है कि हिंदू धर्म के दर्शन वैधानिक दर्शन, और नैतिक दर्शन में किसी प्रकार का भेद क्यों नहीं है।
- यह पैरा श्री यशबंत रामकृष्ण डाटे के इस विषय पर लेख से लिया है जो मराठी पत्रिका ‘स्वाध्याय
नं. 7, 8, प्रथम वर्ष के पृ. 18-21 पर प्रकाशित है।