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हिंदुत्व का दर्शन

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इससे हम ऐसा नहीं कह सकते है कि हिंदुओं में कोई नैतिक आचार-संहिता नहीं है। निश्चित रूप से उनमें ऐसी आचार-संहिता है। परंतु यह बहुत ही उचित होगा कि हम उन आचरण के नियमों की प्रकृति तथा स्वरूप जान लें, जिन्हें हिंदू नीतिक शास्त्र नैतिक कहते हैं।

हिंदू जिसे नैति मानते हैं, उस आचार-संहिता का स्वरूप जानने के लिए यह उचित होगा कि हम अपना कार्य यह मानकर आरंभ करें कि समाज में आचरण ख्1, के तीन स्तर होते हैं, जिनमें फर्क करना आवश्यक है। (1) मूलभूत आवश्यकताओं तथा स्वभाव से निर्मित होने वाला आचरण, (2) समाज के नियमों से नियंत्रित आचरण, और (3) व्यक्तिगत विवेक बुद्धि से नियंत्रित आचरण। पहले स्तर के आचरण को हम नैतिक आचरण नहीं कहते हैं। वह अनैतिक भी नहीं है। यह आचरण उन शक्तियों द्वारा नियंत्रित होता है, जो अपने उद्देश्य में नैतिक नहीं होती, परंतु परिणामों के लिए मूल्यवान होती है यह शक्तियां शारीरिक सामाजिक अथवा मनोवैज्ञानिक होती हैं। इनका एक निश्चित उद्देश्य होता है, जैसे कि भूख मिटाना अथवा शत्रु के विरोध में शस्त्र उठाना। पंरतु लक्ष्य वह होता है जो हमारे शारीरिक, अथवा स्वाभाविक रूप से निर्धारित किया जाता है और जब तक इसको केवल एक न टालने की बात मानकर चलते हैं और उसकी तुलना अन्य कीमती तथा स्वीकृत बातों से नहीं करते, तब तक वह उचित रूप से नैति नहीं मानी जा सकती है। दूसरे स्तर का आचरण निस्संदेह सामाजिक है। जहां-जहां मनुष्य गुट बनाकर रहते हैं, वहां-वहां उनके कार्य करने के कुछ निश्चित मार्ग होते हैं जो उस गुट के लिए समान-रूप से लागू होते हैं और वह पीढ़ी-दर-पीढ़ी चलते हैं इन स्वीकृत तौर-तरीकों को उस गुट की लोक-नीति या नैतिकता कहा जाता है। उन नियमों का पालन करना, यही उस गुट का निर्णय है, ऐसा माना जाता है। उस गुट का कल्याण उनके साथ संबद्ध है, ऐसा माना जाता है। प्रत्येक कोई व्यक्ति का यह कर्तव्य होता है कि वह उनका पालन करे और व्यक्ति उनके विपरीत आचरण करता है, तब उसे यह महसूस कराया जाता है कि गुट को यह बात मंजूर नहीं है इस आचरण को हम सही अर्थ में नैतिक आचरण नहीं कह सकते हैं, क्योंकि इसमें अंतिम उद्देश्य को समाज द्वारा निर्धारित श्रेष्ठ मानक माना गया है। यदि उसे नैतिक कहा गया है तो इसलिए क्योंकि वह समाज की नैतिकता और लोक-नीति के अनुरूप है इसे पारंपरिक रूप से तो नैमि कहा जा सकता है। तीसरे स्तर का जो आचरण है उसे ही केवल सही अर्थ तथा संपूर्ण रूप में नैतिक कहा जा सकता है ऐसा इसलिए कहा जा सकता है क्योंकि इस प्रकार से एक व्यक्ति उचित बात को मानता है अथवा उत्तम बात को स्वीकार करता है और उसकी पूर्ति के लिए मुक्त रूप से पूरी लगन से कार्य करता है, वह व्यक्ति किसी बात को केवल इसलिए

  1. इसमें मैंने पूर्णतः ‘क्राउले एवं तुफतृस’ की व्याख्या का अनुगमन किया है जो

उन्होंने अपनी नीति विषयक पुस्तक में दी है।