96 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
नहीं मानता है क्योंकि वह अटल है अथवा उसका पालन इसलिए नहीं करता क्योंकि उसे समाज की मान्यता है। पर व्यक्ति अपने ध्येय का स्वयं चयन करता है और उसे महत्वपूर्ण मानकर उसके लिए स्वयं को जिम्मेदार ठहराता है उसकी नैतिकता विचारों से संबंधित होती हैं।
इन तीन स्तरों में से किस स्तर पर हिंदुओं की नैतिकता अधिष्ठित है। यह बिल्कुल स्पष्ट है कि उनकी नैतिकता तीसरे स्तर पर स्थित नहीं। इसका अर्थ यह है कि हिंदू सामाजिक है। किन्तु सही अर्थों में नैतिक नहीं हैं जिन उद्देश्यों को वह प्राप्त करता है उनकी वही जिम्मेदारी नहीं लेता। वह स्वेच्छा से समाज का एक साधन बन जाता है और अनुसरण करने में ही संतोष पाता है। वे अपने समाज से बिना किसी भय के अपना अलग मत व्यक्त करने के लिए मुक्त नहीं है। पाप से संबंधित उसकी जो धारणाएं है, वे उसके अनैतिक चरित्र का एक निश्चित प्रमाण है। विष्णुपुराण में पापकर्मों की एक सूची आती है, जो नौ वर्गों में विभाजित हैः
(1) अतिपातक (घोर पाप) निकट संबंधियों के साथ व्यभिचार जिसके लिए आत्मदहन जैसे प्रायश्चित व्यवस्था का विधान है।
(2) महापातक (बड़ा पाप) ब्राह्मण की हत्या, पूजा विधि जल को पीना, ब्राह्मण के ‘सवर्ण अलंकारों की चोरी, गुरु, पत्नी के साथ यौन संबंध और इसके साथ ही ऐसे पाप करने वालों के साथ सामाजिक संबंध रखना।
(3) अनुपातक (छोटे इसी प्रकार के पाप) इनमें कुछ अन्य वर्गों के लोगों की हत्या, झूठे साक्ष्य देना और मित्र की हत्या, संबंध और ब्राह्मण की जमीन अथवा संपत्ति की चोरी करना तथा कुछ विशेष प्रकार यौन संबंध और व्यभिचार आदि का समावेश होता है।
(4) उपपातक (छोटे पाप) झूठा ब्यान देना, कुछ विशेष धार्मिक कर्तव्यों की उपेक्षा करना व्यभिचार, गैर कानूनी कब्जा, बड़े भाई से पहले विवाह करने का अपराध, देवता तथा पितरात्मा के प्रति उत्तरदायित्व न निभाना तथ नास्तिक होना आदि।
(5) जाति ब्रह्मसंकर (जाति खोने का पाप) ब्राह्मण को शारीरिक वेदना पहुंचाना, ऐसी वस्तुओं को सूंघना जिन्हें नहीं सूंघना चाहिए, कुटिल व्यवहार करना तथा कुछ अस्वाभाविक अपराध करना।
(6) सामकरीकरण (वर्ग संकर जाति में पतन होने वाले पाप) जंगली अथवा पालतू जानवरों की हत्या।
(7) आपवित्रकरण (ऐसे पाप, जो किसी को भिक्षा ग्रहण योग्य नहीं मानते) नीचे व्यक्ति से भिक्षा ग्रहण करना और भेंट-वस्तु स्वीकार करना। शूद्र की सेवा करना, उसके साथ रहना, उसे पैसा उधार देना और उसके साथ व्यापार करना।
(8) मलवाह (ऐसे पाप जो अपवित्र बनाते हैं) पक्षी, जलचर प्राणी, कीटाणु