1. हिंदुत्व का दर्शन - Page 112

हिंदुत्व का दर्शन

97

तथा कीड़ों की हत्या करना ऐसे फल अथवा वनस्पति खाना जिससे मद्यपान के समान नशा हो जाता है।

(9) प्रकीर्ण (मिले जुले) ऐसे सभी पाप-कर्म जिनका ऊपर के प्रकारों में समावेश नहीं है।

पापों की यह पूरी सूची नहीं है परंतु निश्चित ही वह एक लंबी तथा विस्तृत सूची है जो हिंदु के पाप की धारणाओं के बारे में हमें पर्याप्त जानकारी देती है। प्रथम स्थान पर वह मनुष्य का उसकी सुनिर्धारित आचार-संहिता के पतित होने का अर्थ व्यक्त करती है। दूसरे स्थान पर उसका अर्थ है, मनुष्य का अस्वच्छ होकर अपवित्र बन जाना। पातक शब्द का मूल अर्थ भी यही है। इसका मतलब है, पतन होना और अस्वच्छ होना। दोनों ही मामलों में हिंदु धारणा के अनुसार पाप आत्मा का रोग है। पहले अर्थ में वह केवल बाहरी आचरण के नियम का उल्लंघन है। दूसरे अर्थ में शरीर का अपवित्र होना, जिसे धार्मिक यात्रा अथवा यज्ञदान दोनों के द्वारा भी स्वच्छ तथा पवित्र बनाया जा सकता है। परंतु आत्मा का अपवित्र होना, जो बुरे विचार तथा उद्देश्यों के कारण होता है, इस अर्थ से यह धारणा कभी भी नहीं रही।

इस बात से स्पष्ट है कि हिंदुओं की नैतिकता केवल सामाजिक है। इसका अर्थ यह है कि उनकी नैतिकता का स्तर पूर्ण रूप से पारंपरिक तथा औपचारिक है। इस नैतिकता के दो हानिकारक पहलू हैं। प्रथम स्थान पर, यह बात निश्चित नहीं है कि इसे हमेशा ईमानदारी और पवित्रता की प्रेरणा से आवेशित किया जाएगा। क्योंकि यह बात तभी हो सकती है जब नैतिकता किसी व्यक्ति की भावना तथा उद्देश्य में बहुत गहरा प्रवेश करती है और जिसके कारण मानवीय आचरण में किसी प्रकार का बहाना करने के लिए कोई स्थान नहीं रह जाता है। दूसरे स्थान पर व्यावहारिक नैतिकता मनुष्य के लिए एक प्रकार के रुकावट तथा अपने वहाव में खींचने की शक्ति दोनों ही हैं। वह आम आदमी को रोकने का काम करती है और जो लोग आगे बढ़ना चाहते हैं उन्हें भी किसी पानी के जहाज के समान लंगर के पीछे जकड़ कर रखने का कार्य करती है। औपचारिक नैतिकता केवल नैतिक स्थिरता का ही दूसरा नाम है। जहां-जहां औपचारिक नैतिकता ही एकमात्र नैतिकता है, उन सभी मामलों में यही बात लागू होती है। परंतु हिंदुओं की औपचारिक नैतिकता गुण-सम्पन्न आचरण का एक और भी दुष्ट पहलू है जो उसकी विशेषता है व्यावहारिक नैतिकता गुण आचरण की बात है। सामान्यतः गुण-संपन्न आचरण ऐसा होना चाहिए जो सर्वसाधारण अथवा सार्वजनिक दृष्टि से उत्तम हो। परंतु हिंदु धर्म में गुण-संपन्न आचरण का ईश्वर की पूजा अथवा समाज का सर्वसाधारण हित, इनके साथ कोई संबंध नहीं है। हिंदु धर्म में गुण-संपन्न आचरण का संबंध ब्राह्मण के प्रति आदर-सम्मान व्यक्त करने तथा उसे दक्षिणा देने से है। महामानव द्धब्राह्मणऋ की पूजी करना, यही हिंदू नीति शास्त्र है।