1. हिंदुत्व का दर्शन - Page 113

98 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

ऐसी स्थिति में, यदि मैं हिंदू नीति-शास्त्र को भी हिंदू धर्म के दर्शन का अनुमान करने के लिए आधार बनाता हूं, तब भी क्या फर्क पड़ता है? हिंदू धर्म के अधिकांश छात्र यह बात भूल जाते हैं कि जिस प्रकार हिंदू धर्म में कानून और धर्म में कोई अंतर नहीं है, इसी तरह कानून और नीति-शास्त्र, दोनों में कोई अंतर नहीं है। दोनों का संबंध एक ही बात से है। वह बात यह है कि निम्न स्तर के हिंदुओं के आचरण को नियंत्रित करना, ताकि वे श्रेष्ठ हिंदुओं के उद्देश्यों की पूर्ति कर सकें।

तीसरे, यह आपत्ति उठाई जा सकती है कि मैंने उपनिषद जो कि हिंदू दर्शन का सही स्रोत है, उस पर विचार न करके, हिंदू धर्म के दर्शन का बिल्कुल ही झूठा चित्र प्रस्तुत किया है।

मैं इस बात को स्वीकार करता हूं कि मैंने उपनिषदों पर विचार नहीं किया है। लेकिन इसके लिए मेरे पास कुछ कारण हैं और मेरा यह विश्वास है कि ऐसा न करने के वह बहुत ठोस कारण हं।ै हिंदू धर्म दर्शन से मेरा संबंध धर्म के दर्शन के एक भाग के रूप में है। मेरा संबंध हिंदू दर्शन से नहीं है। यदि मेरा संबंध हिंदू दर्शन से होता, तब मेरे लिए आवश्यक हो जाता है कि मैं उपनिषद की छानबीन करूं। परंतु फिर भी उपनिषद की छानबीन करने के लिए मैं तैयार हूं क्योंकि मैं यह संदेह नहीं रखना चाहता हूं कि जिसे मैंने हिंदू धर्म का दर्शन बताया है, वही वास्तव में उपनिषद का दर्शन भी है।

उपनिषद का दर्शन बहुत ही कम शब्दों में व्यक्त किया जा सकता है। इक्सले द्वारा इसे बहुत ही संक्षेप में उत्तम ढंग से व्यक्त किया गया है। ख्1, वह कहता है उपनिषद दर्शन इस बात से सहमत है कि µ

‘‘मन के अथवा किसी वस्तु के हृदय स्वरूप में होने वाले क्रमिक बदलाव के सूत्र

के अंतर्गत छुपी हुई स्थायी वास्तविकता अथवा पदार्थ के अस्तित्व को समझने में

ही उपनिषद दर्शन का सार है। विश्व का सारभूत पदार्थ है ब्रह्मा और व्यक्ति की

‘आत्मा’ और ब्रह्मा तथा आत्मा दोनों भी एक दूसरे के केवल उनकी अभिव्यक्ति,

भावना, विचार, इच्छाएं, सुख तथा दुख के कारण अलग हैं, जिसके कारण जीवन

का भ्रामक मायाजाल खड़ा होता है जो लोग अज्ञानी होते हैं, वे उसे ही सच्चाई

मानते हैं। इसलिए उनकी आत्मा नित्य भ्रांतियों से घिरी रहती है, जो अपनी इच्छाओं

के बंधनों में जकड़ कर दुख-यातनाओं की सजा सहन करते हैं।’’

उपनिषद के ऐसे दर्शन का भला क्या उपयोग है? उपनिषद के दर्शन का मतलब है स्वचेतना के विनाश द्वारा अपनी इच्छाएं नष्ट करके तथ संन्यास लेकर जीवन के

  1. इवोल्यूशन एंड ऐथिक्स, पृ. 63

  2. इवोल्यूशन एंड ऐथिक्स, पृ. 64