हिंदुत्व का दर्शन
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अस्तित्व के संघर्ष के पीछे हटना। जीवन-पद्धति के रूप में हक्सले ख्2, ने उसकी बहुत ही कठोर शब्दों में आलोचना की हैः
‘‘भारतीय संन्यासियों-तपस्वियों ने तपश्चर्या द्वारा शारीरिक रूप से जितना
कष्ट सहा उसका अन्यत्र उदाहरण कठिन है। आधुनिक युग की किसी भी
संन्यासी मठवादी प्रथा ने मानवीय मन को र्निविकार निंद्रित अवस्था की
उस हद तक नहीं गिराया, जो उसकी सर्वमान्य पतिवत्रता का पागलपन की
भावना से भर जाने का खतरा उत्पन्न करती हो।’’
परंतु उपनिषद के दर्शन की यह आलोचना लाला हरदयाल ख्3, ने उसकी जो सार्वजनिक भर्त्सना की है, उसकी तुलना में कुछ भी नहीं है, वे कहते हैं -
‘‘उपनिषद यह दावा करता है कि उसके ज्ञान से प्रत्येक वस्तु का ज्ञान प्राप्त
होता है। परिपूर्णता की यह लालसा ही भारत के कृत्रिम अध्यात्मवाद का
आधार बन गई है। उपनिषद के यह लेख मूर्ख विचार, असंगत कल्पनाएं
तथा भ्रमित करने वाले अनुमानों से भरे हैं और हमने यह बात नहीं समझी
कि यह सभी निरर्थक हैं। हम पुराने ही रास्तों पर चल रहे हैं। हम अत्युत्तम
यूरोपीयन सामाजिक विचारों का अनुवाद करने के स्थान पर, इन्हीं पुरानी
किताबों का संपादन करते रहते हैं। यदि फ्रेडरिक हेरीमन, ब्रयूक्स, बेबेल
एनातोले फ्रांस, हार्वे, हाईकाल, जीडिग्स और मार्शल अपना समय डुंस,
स्कोटस और थामस एक्वीनस आदि के निबंधों की पुनर्रचना और पेंटाटियूय
का कानून तथा बिओवुल्फ की कविता की गुण-संपन्नता की चर्चा करने में
बिताते, तब यूरोप की स्थिति कैसी रहती? भारतीय विद्वानों तथा बुद्धिजीवियों
की जो बातें निरर्थक तथा पुरानी हैं, उनके प्रति एक प्रकार का पागल मोह
है। इस प्रकार विकासशील मनुष्यों द्वारा स्थापित संस्थाएं अपने युवकों को
वेदों के माध्यम से संस्कृत व्याकरण की शिक्षा देने का उद्देश्य रखती हैं।
बुद्धिमानी प्राप्त करने की लालसा में यह कितना गलत कदम है। यह ऐसा
प्रयास है, जैसे कोई कारवौं किसी रेगिस्तान से ताजे पानी की खोज में भरे
हुए समुद्र के किनारे की ओर चले जा रहा है। भारत के नवयुवकों, अपने
दुर्गंधयुक्त आध्यात्मिक ग्रंथों में बुद्धिमत्ता देखने का प्रयास न करो। इनमें
शब्दों की अंतहीन कसरत के अलावा कुछ भी नहीं है। राझायू और वोल्टेयर,
प्लेटों और एरीस्टोटल, हाइकल और स्पैंसर, मार्क्स और टालस्टाय, रस्किन
और कौमटे तथा उसकी समस्याओं को समझना चाहते हैं।’’
- मार्डन रिव्यू, जुलाई,