100 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
परंतु, आलोचना को दूर रखें, तब क्या हिंदू धर्म पर सामाजिक तथा राजनीतिक व्यवस्था के रूप में उपनिषद के दर्शन का कोई प्रभाव है? इस बात में कोई संदेह नहीं है कि उपनिषद दर्शन के हिंदुओं की सामाजिक और नैतिक व्यवस्था पर कोई भी प्रभाव न होने की दृष्टि से यह बहुत ही प्रभावहीन तथा परिणाम शून्य ही रहा है।
इस दुर्भाग्यपूर्ण नतीजे के कारणों को जानना इस स्थान पर अनुचित नहीं होगा। एक कारण बिल्कुल स्पष्ट है। उपनिषद का दर्शन अपूर्ण ही रहा और इसके कारण उससे कोई परिणाम प्राप्त नहीं हो सका, जो होना चाहिए था। यह बात तब पूर्णरूप से स्पष्ट हो जाती है यदि हम यह पूछें कि उपनिषद की क्या प्रमुखता है। प्रो. मैक्समूलर ख्1, के शब्दों में उपनिषद का मूल स्वर है ‘स्वयं को पहचानों’। उपनिषद का ‘स्वयं को पहचानों’’ का मतलब है, ‘सत्य क्या है, उसे जान लो, जो तुम्हारे अहंकार के नीचे दबा हुआ है, और उसे प्राप्त करो तथा उसे उसके श्रेष्ठतम तथा नित्य रूप मेंं जानो। वह ऐसा एक है जिसके समान कोई दूसरा नहीं है, और यही संपूर्ण विश्व की अंतर्मन भावना है।’
आत्मा और ब्रह्म एक है, यह एक सच्चाई है, एक महान सत्य है जो उपनिषदों ने कहा कि उन्होंने खोज निकाला और इसलिए उन्होंने मनुष्य से कहा कि वे उसे जानें। अब उपनिषद का दर्शन परिणाम शून्य क्यों रहा, इसके अनेक कारण हैं। उसकी चर्चा किसी अन्य स्थान पर करना चाहूंगा। परंतु इस स्थान पर मैं केवल एक ही कारण का उल्लेख करता हूं। उपनिषद के तत्ववेत्ता यह बात नहीं समझ सके कि केवल सत्य को जानना ही पर्याप्त नहीं है। प्रत्येक मनुष्य को सत्य से प्रेम करना भी सीखना चाहिए। दर्शन और धर्म में जो भेद है, वह दो प्रकार से स्पष्ट किया जा सकता है। दर्शन का संबंध सत्य को जानने के साथ होता है। धर्म का संबंध सत्य पर आस्था करने के साथ होता है। दर्शन अपरिवर्तनय होता है। परंतु धर्म परिवर्तनशील होता है। यह भिन्नताएं एक ही वस्तु के केवल दो पहलू हैं। दर्शन अपरिवर्तनीय होता है। क्योंकि वह केवल सत्य जानने से ही संबंधित है। धर्म परिवर्तनीय है क्योंकि वह सत्य पर आस्था करने से संबंधित है, जैसा कि मैक्सप्लोमन ख्2, ने उत्तम प्रकार से स्पष्ट किया हैः
‘‘.........जब तक कि धर्म परिवर्तनशील नहीं रहता और किसी वस्तु के लिए
हममें प्रेम भावना उत्पन्न नहीं करता है, हमें उस वस्तु के बिना रहना ही
उत्तम होगा, जिसे हम धर्म कहते हैं क्योंकि धर्म सत्य की दृष्टि है और यदि
हमारी सत्य की दृष्टि के साथ उसके प्रति प्रेम की भावना नहीं रहती है,
तब हमारे लिए यही उत्तम होगा कि हम उस दृष्टि को ही न प्राप्त करें। बुरा
हिब्बर्ट लेक्चर, 1878, पृ. 317
दि नेमिसिस ऑफ इन्इफैक्चुअल रिलीजन, अडेल्फी, जनवरी, 1941