हिंदुत्व का दर्शन
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मनुष्य वही होता है, जिसने सत्य को केवल उसका तिरस्कार करने के लिए
देखा है। टेलीसन ने कहा है, ‘जब हम किसी को देखते हैं, तब उस पर
अत्यधिक प्रेम करना चाहिए।’ परंतु ऐसा नहीं होता है। इस बात को उसकी
वस्तुपरकता से देखते हुए जो श्रेष्ठ होता है, वह उसकी भिन्नता तथा अंतर
के कारण चमकता है जिससे हम भयभीत हो जाते हैं, और जिससे हम डरते
हैं, उससे घृणा करने लगते हैं।’’
सभी लोकोत्तर दर्शनों की यही नियति है। उनका जीवन के मार्ग पर कोई प्रभाव नहीं रहता। जैसा ब्लेक ने कहा है, ‘धर्म राजनीति है और राजनीति बंधुत्व है’ दर्शन को धर्म बनाना आवश्यक है। इसका मतलब है कि उसे कार्यरत नीति-शास्त्र बनना चाहिए। वह केवल अध्यात्मवाद नहीं रहना चाहिए। जैसा प्लामन ने कहा है µ
‘यदि धर्म एक अध्यात्मवाद बनकर रह जाए और उसके अलावा कुछ भी
नहीं, तब एक बात निश्चित है कि उसका सीधे तथा सामान्य मनुष्यों के
साथ कोई संबंध नहीं होगा।
‘‘धर्म को पूर्ण रूप से अध्यात्मवाद की पकड़ में रखने का मतलब है, उसे
मूर्खता का विषय बनाना। क्योंकि जिस प्रकार हम किसी ऐसी बात में जो
प्रत्यक्ष तथा सजीव रूप से राजनीति में परिणामकारक नहीं है, विश्वास करते
हैं उसी प्रकार अंततः धर्म में विश्वास करना भी कठोर शब्दों में एक मूर्खता
ही है, क्योंकि किसी परिणामकारक अर्थ से ऐसा विश्वास किसी प्रकार का
फर्क नहीं करता और समय तथा आकांक्षा की इस दुनिया में जो बात कोई
फर्क नहीं कर सकती, वह अस्तित्वहीन ही होती है।’’
इन्हीं कुछ कारणों के कारण उपनिषद का दर्शन परिणामशून्य साबित हुआ।
इसलिए यह बात निर्विवाद है कि हिंदु नीति-शास्त्र और उपनिषदों के दर्शन के बावजूद, मनु द्वारा उद्घोषित हिंदू धर्म के दर्शन से एक बिंदी अथवा बहुत ही मामूली सी बात भी नहीं मिटाई जा सकी। मनु ने धर्म के नाम पर जो कलंकित शिक्षा दी, उसे नष्ट करने के लिए वे बहुत ही परिणामशून्य तथा शक्तिहीन थे और उनके अस्तित्व के होते हुए भी हम यह भी कह सकते हैं कि µ
हिंदू धर्म तेरा नाम असमानता है।
VI
असमानता, हिंदू धर्म की आत्मा है। हिंदू धर्म की नैतिकता केवल सामाजिक है। कम-से-कम यह बात निश्चित है कि यह नैतिकता तथा मानवता से असंबद्ध है और जो बात नैतिकता तथा मानवता से असंबद्ध होती है, वह बात आसानी से अनैतिक,