102 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
अमानवीय तथा कुख्यात बन जाती है। आज हिंदू धर्म ऐसा ही कुछ बन गया है। जो लोग इस बात पर संदेह करते हैं अथवा इस धारणा को नकारते हैं उन लोगों को हिंदू समाज की सामाजिक रचना की समीक्षा करनी चाहिए और उसके साथ ही उस रचना के कुछ तत्वों का वर्तमान स्थिति पर चिंतन करना चाहिए। हम कुछ निम्नलिखित उदाहरण लेते हैं।
पहले हम आदिवासी कबीले समाज की ओर देखें। सभ्यता की किसी अवस्था में वे जीवन व्यतीत कर रहे हैं?
मानवीय सभ्यता के इतिहास में मानव विकास के जंगलीपन से लेकर बर्बरता तक और बर्बरता से लेकर सभ्यता तक सभी अवस्थाओं का समावेश है। उसकी एक अवस्था में जो परिवर्तन हुआ है, वह परिवर्तन सदा ही ज्ञान की अथवा कला की किसी न किसी शाखा में कोई खोज अथवा आविष्कार के साथ हुआ है, जिसके परिणामस्वरूप मनुष्य उन्नति की ओर बढ़ा।
किसी स्पष्ट भाषा का विकास होना पहली चीज थी जो मानव विकास की दृष्टि से पहली महत्वपूर्ण बात थी, जिसने मनुष्य को असभ्य मनुष्य से अलग किया यह असभ्यता पहली अवस्था को प्रकट करती है। असभ्यता की मध्यावस्था उत्पादन के ज्ञान से तथा अग्नि के उपयोग से आरंभ हुई। इस अद्भुत खोज के कारण मनुष्य अपने निवास स्थान के अनिश्चित सीमाओं तक बढ़ाने योग्य बन गया। वह अपना जंगल का घर छोड़कर विभिन्न स्थानों पर तथा सर्द वातावरण में जाने लगा और उसने अपनी भोजन सामग्री में मांस-मछली का समावेश करके बढ़ोतरी की। उसकी अगली खोज थी, तीर और कमान की। आदिमानव की यह सबसे बड़ी उपलब्धि थी और जंगली मनुष्य के विकास की यह चरम अवस्था है। वास्तव में वह एक अद्भुत औजार था। इस हथियार को धारण करने वाला, सबसे गतिमान पशु की हत्या भी कर सकता था तथा किसी भी हिंसक पशु से अपनी रक्षा भी कर सकता था।
जंगलीपन से बर्बरता की अवस्था मिट्टी के बर्तनों की खोज से आरंभ हुई। तब तक मनुष्य के पास ऐसे कोई बर्तन नहीं थे, जो आग से नष्ट नहीं हो सकते थे। बर्तनों के बिना मनुष्य न तो खाना पका सकता था और न किसी वस्तु का संग्रह कर सकता था। निस्संदेह मिट्टी के बर्तनों का संस्कृति के निर्माण पर बड़ा ही प्रभाव रहा।
बर्बरता की मध्य अवस्था तब आरंभ हुई, जब मनुष्य ने हिंसक पशुओं को पालतू बनाना सीखा। मनुष्य ने यह बात जान की कि पालतू जानवर उसके लिए उपयोग हो सकते हैं। अब मनुष्य चरवाहा बन गया और फिर वह भोजन के लिए हिंसक पशुओं का खतरनाक स्थिति में पीछा करने पर निर्भर नहीं रहने लगा। सभी ऋतुओं में दूध की उपलब्धि ने उसकी खाने-पीने की वस्तुओं में बहुत ही महत्वपूर्ण बढ़ोतरी की। घोड़े तथा