हिंदुत्व का दर्शन
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ऊंटों की सहायता से वह दूर-दूर तक सफर करने लगा था जो अब तक उसके लिए असंभव था। पालतू जानवर उसके लिए व्यापार में सहायक बन गए, जिसके कारण वह अपनी वस्तुओं का तथा अपने विचारों का भी आदान-प्रदान करने लगा।
उसके बाद की खोज थी, लोहे को गलाकर उसकी वस्तुएं बनाने की कला। जंगलों में रहने वाले मनुष्यों की उन्नति में यह एक बहुत ही उच्चतम अवस्था है। इस खोज के साथ मनुष्य एक प्रकार से ‘औजार बनाने वाला प्राणी’ बन गया, जो अपने औजारों से लकड़ी तथा पत्थर को विभिन्न प्रकार देने लगा और मकान तथा पुल बनाने लगा।
और इसके साथ ही जंगल में रहने वाले मनुष्य ने जो उन्नति की, उसकी अंतिम अवस्था का अंत होता है।
‘सभ्यता’, इस शब्द के परिपूर्ण अर्थ से एक सभ्य मनुष्य को जंगली मनुष्य से अलग करने वाली रेखा वहां से उभरती है, जहां कल्पनाओं का चित्रांकित चिन्हों के माध्यम से एक-दूसरे को समझाने की कला का उदय हुआ, जिसे लिखने की कला कहा जाता है। इस कला को साथ मनुष्य ने समय पर विजय प्राप्त कर ली, जैसे कि पहले की खोजों से उसने अंतराल पर विजय प्राप्त की थी। अब वह अपनी कृतियां तथा विचारों को लिखने लगा। इसके बाद, उसका ज्ञान, उसके सुहाने सपने, उसकी नैतिक आकांक्षाएं ऐसे आकार में लिखना संभव हो गया, जो न केवल उसके समकालीन, बल्कि उसके बाद आने वाली सभी पीढि़यां पढ़ सकें। मनुष्य के लिए उसका इतिहास एक सुरक्षित और संरक्षित बन गया। यह चरम परांकाष्ठा सभ्यता के प्रारंभ का प्रतीक है।
अब हम यहां रूककर यह बात पूछना चाहेंगे कि हमारे आदिवासी जन सभ्यता की किस अवस्था में जी रहे हैं।
आदिवासी ख्1, नाम ही उनकी वर्तमान अवस्था को स्पष्ट करता है, जिन लोगों को उस नाम से पुकारा जाता है वे जंगलों में छोटी-छोटी बिखरी झोंपडि़यों में रहते हैं। वे जंगली वनस्पति तथा फूल-पतियां खाकर जीते हैं। भोजन प्राप्त करने के उद्देश्य से वे मछली पकड़ते अथवा शिकार करते हैं। उनकी सामाजिक अर्थव्यवस्था में खेती को बहुत ही गौण स्थान प्राप्त है। अन्न प्राप्त करना, यह एक बहुत ही संकट की बात होने के कारण वे लगभग भुखमरी का जीवन ही व्यतीत करते हैं, जिससे कोई मुक्ति नहीं है। जहां तक कपड़ों का संबंध है, वे उसका इतना कम उपयोग करते हैं कि कपड़े उनके शरीर पर लगभग नहीं के बराबर ही होते हैं। वे लगभग नग्न अवस्था
- यह तथा अन्य सूचना ‘भारती की जनगणना’, 1931 के प्रथम भाग से ली गई है।