1. हिंदुत्व का दर्शन - Page 119

104 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

में ही रहते हैं। एक आदिवासी जाति का नाम ‘बोंडा पोराज’ है। इसका अर्थ है ‘नग्न पोरजस’। ऐसा कहा जाता है कि इन लोगों में औरतें बहुत ही संकीर्ण वस्त्र का एक टुकड़ा पहनती हैं जो ढंकने के लिए लहंगे का कार्य करता है। उनका यह वस्त्र असम के मामजाक नागा आदिवासी लोगों के वस्त्र के समान है, जिसके दोनों सिरे ऊपर कमर के साथ बहुत ही कठिनाई से मिलते हैं। यह लहंगे जैसा वस्त्र जंगली पेड़ों के धागे से घर पर ही औरतें बना लेती हैं। लड़कियां गुटकों की मालाएं पहनती हैं जो कि लगभग मौमजाक आदिवासी स्त्रियों से मिलती-जुलती है। अन्यथा औरतें कुछ भी नहीं पहनतीं। औरतें अपने सारे सिर के बालों को मुंडन करती हैं। इन आदिवासियों में निजाम के राज्य में फराहाबाद के पास रहने वाली एक चैन्चू नाम की आदिवासी जाति है। ऐसा कहा जाता है कि उनके मकान शुकु के आकार के बांस के बने हाते हैं, जिसमें एक मध्यबिंदु से धलान होती है, जो घास की बहुत ही बारीक तह से ढकी होती है। उनके पास वस्तुओं के नाम पर कुछ भी नहीं अथवा बहुत ही कम चीजे होती हैं। वे बहुत ही कम वस्त्र पहनते हैं पुरुष लंगोट बांधते हैं और औरतें छोटा-सा लहंगा और ब्जाऊज पहनती हैं। खाना पकाने के बहुत ही कम बर्तन होते हैं, अथवा दो टोकरियां होती हैं, जिनमें कभी-कभी खाने के कुछ दाने रखे होते हैं। ये गाय-बकरियां पालते हैं और इस विशेष गांव में कुछ खेती भी करते हैं। अन्य स्थानों पर वे जंगली वस्तुएं तथा मधु बेचकर ही अपना पेट पालते हैं। एक अन्य आदिवासी जाति मोरिया के बारे में कहा जाता है कि उनके पुरुष कमर में एक वस्त्र बांधते हैं, जिसका एक सिरा सामने लटका होता है। उनके बदन पर गुटकों की मालाएं भी होती हैं तथा जब वे नृत्य करते हैं, तब अपनी पगड़ी में मुर्गे अथवा मोर के पंख लगाते हैं। अनेक लड़कियां भारी मात्रा में विशेष रूप से चेहरे पर गोदना (शरीर पर गुदवाना) कराती हैं। उनमें से कुछ लड़कियां पैरों पर गोदन करती है। गोदन के प्रकार प्रत्येक लड़की की रुचि के अनुसार होते हैं और उसे कांटे तथा सुई से किया जाता है। अपने सिर के बालों में अनेक लड़कियां जंगली मुर्गे के पंख लगाती हैं और उसके साथ ही जूड़ों में लकड़ी, टीन अथवा पीतल की कंघी बांधती हैं।

इन आदिवासी कबीलों को कुछ भी खाने में, यहां तक कि कीड़े-मकौड़े खाने में भी कोई हिचकिचाहट नहीं होती है और वास्तव में कोई भी ऐसा मांस नहीं है जो ये लोग न खाते हों, चाहे वह जानवर नैसर्गिक कारण से मरा हो अथवा चार-छह दिन अथवा उससे भी पहले किसी शेर द्वारा मारा गया हो।

इन लोगों का एक वर्ग अपराधी जातियां हैं।

जिस तरह आदिवासी जातियां जंगलों में रहती हैं, इसके विपरीत ये अपराधी जातियां सुगम प्रदेशों में बहुत ही नजदीक तथा प्रायः सभ्य समाज जीवन के बीच में रहती हैं। होलीयस ने अपनी किताब संयुक्त प्रांत की अपराधी जातियां में इन लोगों