106 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
सैनिकों के मुक्त गुटों को भर्ती कर सकें ताकि ये लोग व्यावसायिक लुटेरों के संगठन बन जाएं। पिंडारी की महत्वाकांक्षा प्रदेश जीतने की नहीं होती थी। उनका लक्ष्य केवल अपने लिए लूटी संपत्ति तथा धन जमा करना ही होता था। साधारण लूट तथ डाका ही उनका व्यवसाय था। वे कोई नियम नहीं मानते थे, वे किसी के भी अधीन नहीं थे। उनकी किसी के प्रति कोई राजभक्ति नहीं थी। वे किसी का आदर नहीं करते थे और ऊंच-नीच, गरीब सभी लोगों को बिना किसी डर अथवा भेद के लूटते थे।
ठग लोग व्यावसायिक हत्यारों का एक सुसंगठित संगठन था ख्1,, जिसमें 10 से 100 तक लोगों की टोलियां होती थीं, जो विभिन्न भेष में सारे भारत में भ्रमण करती थीं। ये लोग धनवान वर्ग के यात्रियों का विश्वास प्राप्त करते थे और उसके बाद उचित अवसर देखकर उनके गले में रूमाल अथवा फंदा डालकर उनकी गला घोंटकर हत्या करते थे और फिर बाद में उनको लूटकर दफना देते थे। यह सब-कुछ किसी विशेष प्राचीन तथा निश्चित संस्कारों के अनुसार और विशेष धार्मिक विधि की पूर्ति के बाद किया जाता था, जिसमें लूट के माल का पवित्रीकरण संस्कार तथा मीठी वस्तु की आहुति दी जाती थी। वे लोग संहार की हिंदुओं की ‘काली’ देवी के कर्मठ उपासक थे। लाभ के लिए हत्या करना उनके लिए एक धार्मिक कर्तव्य था और उसे पवित्र तथा सम्माननीय व्यवसाय माना जाता था। वास्तव में इन लोगों को इस बात की समझ भी नहीं थी कि वे कुछ गलत कार्य कर रहे हैं और उनकी नैतिक भावनाएं उनके इस कार्य में कोई भी बाधा नहीं बनती थी। काली देवी की इच्छा, जिसके अधिकार के तहत तथा जिसके सम्मान के लिए वे अपने व्यवसाय का पालन करते थे, शुभ-शुभ लक्षणों से उसकी सहमति की बहुत ही जटिल पद्धति के माध्यम से प्रकट की जाती थी। इस आशा के पालन के लिए वे लोग कभी-कभी तो अपने इच्छित शिकार के साथ मीलों तक और कभी-कभी उससे अधिक दूरी तक भी सफर करते थे, कि जब तक उन्हें अपनी इच्छापूर्ति के लिए सुरक्षित अवसर न मिल जाता और जब उनका कार्य पूरा हो जाता था, तब वे अपने आदि देवता के समान में संस्कार-पूर्ति करते थे तथा अपनी लूट का बड़ा हिस्सा उसके लिए अलग निकाल कर रखते थे। इन ठग लोगों की अपनी बेमतलब के शब्दों की भाषा थी तथा उसके साथ ही कुछ ऐसे विशेष चिह्न थे, जिनके द्वारा वे भारत के दूर-दराज के क्षेत्रों में भी अपने सदस्यों को पहचानते थे। इनमें से जो लोग वृद्धावस्था अथवा विकलांग अवस्था के कारण इन कार्यों में क्रियाशील होकर भाग नहीं ले सकते थे, वे चौकीदार, जासूस तथा भोजन पकाने वालों के रूप में उनकी सहायता करते थे। उनके संपूर्ण संगठन के कारण ही वे लोग गुप्त तथा सुरक्षित रूप से अपने कार्य पर जा सकते थे परंतु मुख्य रूप से वह धार्मिक
- इनसाइक्लोपीडिया ब्रिटोनिका, 11वां संस्करण, खंड 26, पृ. 896