हिंदू समाज-व्यवस्थाः इसके मूलभूत सिद्धांत
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जिन विद्वानों ने इस विषय का सूक्ष्मता से अध्ययन किया है, उनका विचार है
कि मानव समाज में मोटे तौर से तो मूल प्रवृत्तियां एक जैसी होती हैं, किन्तु
जब इन प्रवृत्तियों का विस्तार होता है, जब उनमें पूरी तरह भिन्नता दृष्टिगोचर
होने लगती है। उस समय उनकी सार्वभौमिकता विलीन हो जाती है। क्या इन
लक्षणों को मौलिक गुण, जैविक आवश्यकताएं अथवा अवशिष्ट कहा जाए
या कोई अन्य छोटा-मोटा नाम दिया जाए। कोई भी इस बात से इंकार नहीं
कर सकता कि उनका अस्तित्व होता है। शारीरिक शक्ति, कला-कौशल,
भौतिक संपत्ति या मानसिक क्षमता में असमानताएं स्वभाविक हैं। लेकिन
इस विषय पर बल देने की आवश्यकता है। अंत में यह तथ्य सामने आता
है कि मूलभूत लक्षण सभी मानवों में विद्यमान होते हैं। उनकी प्रकृति तथा
अभिव्यक्तियों को ‘नैतिक समानता’ कहा जा सकता है।’’
‘आचार’ शब्द पर जोर दिया जाना चाहिए। सृष्टि के आरंभ से ही आलोचकों में यह परंपरा रही है कि वे शारीरिक शक्ति, प्रतिभा तथा संपत्ति के मामले में यह तत्व उजागर करते रहे हैं कि इस मामलों में मानव एक समान नहीं होते। यह आलोचना अनावश्यक भी है तथा अप्रांसगिक भी। नैतिक समानता के किसी पक्षधर ने मानव-मात्र के बीच विद्यमान स्पष्ट असमानाताओं को उजागर किया हो, जिनके कारण अत्याचार या संस्थागत भोगाधिकार प्रकट होते हैं। स्वतंत्रता की घोषणा यह सुनिश्चित नहीं करती कि सभी मनुष्य समान हैं, बल्कि यह उद्घटित करती है कि वे समान पैदा होते हैं।
संक्षेप में, जब ‘नैतिक समानता’ कहते हैं तो इसका अर्थ है आचार-विचार की समानता। यह एक विश्वास है, अधिकारों की ऐसी मान्यता है, जिसका आदर किया जाना चाहिए। इसको वैसे तो प्रमाणित नहीं किया जा सकता, जैसे गणित के प्रश्न हल कर दिए जाते हैं। इसे शारीरिक शक्ति, प्रतिभा, उद्योग तथा संपत्ति संबंधी असमानताओं के संदर्भ में देखा जाना चाहिए। यह इस बात का निषेध करती है कि मात्र शारीरिक रूप से बलिष्ठता के आधार पर कोई निर्बलों को मारे, खाए या सताए। इसी प्रकार नैतिक समानता के अनुसार प्रतिभा तथा संपत्ति के मामले में भी कोई छूट नहीं दी जा सकती। ऐसी स्थिति में तो कोई भी बल, बुद्धि तथा संपदा में अपने को श्रेष्ठता के पलड़े में भारी मान सकता है। ऐसी परिस्थितियों में सरकार तथा संपत्ति बलवानों के पास चली जाएगी, जब कि गुण तथा प्रतिभा अत्याचारियों के आगे हाथ बांधे खड़े रहेंगे, ठीक वैसे ही जैसे यूनान के दास रोम के विजेताओं की सनकों तथा इच्छाओं को पूरा किया करते थे। अब जब कि नैतिक समानता के सिद्धांत की कटु आलोचना की जा चुकी है, इसमें ऐसा कुछ है जिसे स्वीकार किया जाना चाहिए और उसका अनुकरण किया जाना चाहिए, भले ही इसके प्रति विरोध क्यों न हो। मानव व्यक्तित्वों के प्रति बिना किसी अंदर वाला समाज डाकुओं का समूह होता है।