2. हिंदू समाज व्यवस्था : इसके मूलभूत सिद्धांत - Page 129

114 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

भाईचारे की भावना क्यों अनिवार्य है? भाईचारा मानव के उस गुण का नाम है जिसके अनुसार वह समाज के अन्य व्यक्तियों के साथ प्यार-सम्मान का भाव रखता है और उनके साथ एकरस होने की इच्छा रखता है। इस कथन के स्पष्ट उल्लेख पाल ने किया कि ‘कौमों के इसी इंसानों का खून एक समान है। उनमें से न तो किसी का खून यहूदी है और न यूनानी है, न कोई बंधक है और न कोई स्वतंत्र है, न कोई पुरुष है और न कोई स्त्री है। वे सभी प्रभु ईसा की दृष्टि में एक समान हैं।’ प्लाइमाउथ पहुंचकर इंग्लैंड प्यूरिटन संप्रदाय के पादरियों ने भी कुछ ऐसा ही बहुत अच्छे ढंग से कहा था ः ‘ईश्वर की पवित्र प्रतिज्ञा के अनुसार हम एक शरीर के रूप में साथ-साथ गुथे हुए हैं। ......इसी कारण हम एक-दूसर की भलाई की चिंता करते हैं और संपूर्ण मानवता के हितों के लिए प्रतिबद्ध हैं।’ यही भाव भाईचारे का मूल है। भाई-चारे से सामाजिकता मजबूत होती है और इससे प्रत्येक व्यक्ति में एक ऐसा प्रभावशाली लगाव पैदा होता है, जिसके माध्यम से वे व्यावहारिक रूप से दूसरों के कल्याण के बारे में सोचता है। इससे वह दूसरों की भलाई में अपनी भावनाओं को अधिक से अधिक जोड़ता है या कम से कम इसके लिए व्यावहारिक रवैया अपनाता है। भाई-चारे की मनोवृत्ति उसे सहजता से सचेत करती है कि वह उस व्यक्ति के समान है जो दूसरों को सम्मान देता है। दूसरों की भलाई उसके लिए उतनी ही स्वाभाविक हो जाती है, जितनी कि हमारे अस्तित्व के लिए कोई भौतिक अवस्था आवश्यक होती है। जहां लोग दूसरों के साथ सहानुभूति की संपूर्णता का अनुभव नहीं करते, वहां उनके आचरण में समरसता असंभव होती है जिस व्यक्ति में सामाजिक भावना का अभाव होता है, वह दूसरों के बारे में सिवाय इसके और कुछ नहीं सोच सकते कि वे उसके प्रतिद्वंद्वी हैं। इसलिए वह अपनी खुशियों के लिए उन्हें पराजित करने की चेष्टा में लगा रहता है।

स्वतंत्रता क्या है और स्वतंत्र समाज-व्यवस्था में यह क्यों आवश्यक है?

स्वतंत्रता को दो श्रेणियों में बांटा जा सकता है, एक नागरिक स्वतंत्रता होती है और दूसरी राजनीतिक स्वतंत्रता। नागरिक स्वतंत्रता के अंग हैं - (1) विचरण की स्वतंत्रता, अर्थात् कानूनी प्रक्रिया के बिना बेरोक-टोक आवागमन, (2) अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता_ इसमें विचारों की स्वतंत्रता, पढ़ने की स्वतंत्रता, लिखने की स्वतंत्रता तथा बातचीत करने की स्वतंत्रता शामिल होती है, और (3) कार्य करने की स्वतंत्रता।

पहले प्रकार की स्वतंत्रता निस्संदेह मौलिक स्वतंत्रता है। यह न केवल मौलिक, बल्कि अत्यंत आवश्यक भी है। इसके महत्व के संबंध में कोई संदेह नहीं है। दूसरी स्वतंत्रता जिसे विचारों की स्वतंत्रता कहा जा सकता है, कई कारणों से महत्वपूर्ण है। यह बौद्धिक, नैतिक, राजनीतिक तथा सामाजिक, सभी प्रकार की उन्नति के लिए आवश्यक है। जहां यह स्वतंत्रता नहीं होती, वहां यथास्थिति रूढ़ हो जाती है और