हिंदू समाज-व्यवस्थाः इसके मूलभूत सिद्धांत
115
सभी मौलिकताएं, यहां तक कि अत्यंत आवश्यक मौलिकता भी हतोत्साहित हो जाती है। कार्य की स्वतंत्रता का अर्थ यह है कि व्यक्ति जो चाहे सो करे। इतना ही पर्याप्त नहीं है, कार्य की स्वतंत्रता औपचारिक हो। यह वास्तविक अर्थ में होनी चाहिए। जैसा कि स्पष्ट है, स्वतंत्रता का तात्पर्य विशिष्ट कार्य को करने की प्रभावी शक्ति से है। जहां इस स्वतंत्रता का लाभ उठाने के साधन मौजूद नहीं हैं, वहां यह स्वतंत्रता नहीं है। कार्य करने की वास्तविक स्वतंत्रता केवल वहीं पर होती है, जहां शोषण का समूल नाश कर दिया गया है, जहां एक वर्ग द्वारा दूसरे वर्ग पर अत्याचार नहीं किए जाते, जहां बेरोजगारी नहीं है, जहां गरीबी नहीं है, जहां किसी व्यक्ति को अपने धंधे के हाथ से निकल जाने का भय नहीं है, अपने कार्यों के परिणामस्वरूप जहां व्यक्ति अपने धंधे की हानि घर की हानि तथा रोजी-रोटी की हानि के भय से मुक्त है।
राजनैतिक स्वतंत्रता का तात्पर्य व्यक्ति की उस स्वतंत्रता से है जिसके अनुसार वह कानून बनाने तथा सरकारों को बनाने अथवा बदलने में भागीदार होता है। सरकारों का गठन इसलिए किया जाता है जिससे कि वे व्यक्ति के लिए कुछ अनन्य अधिकार, जैसे जीवन-स्वतंत्रता तथा प्रसन्नता के साधन सुरक्षित ढंग से उपलब्ध कराएं। अतः सरकार वहां से ही अपने अधिकार प्राप्त करे, जिनके अधिकारों को सुरक्षित रखने का दायित्व उसे सौंपा गया है। इसका तात्पर्य यह है कि सरकार को अपना अस्तित्व, अपनी शक्ति, अपना अधिकार उन लोगों से ही प्राप्त करना चाहिए, जिन पर वह शासन करती है। वास्तव में राजनीतिक स्वतंत्रता मानव-व्यक्तित्व तथा समानता के सिद्धांत से उत्पन्न होती है क्योंकि इसका अर्थ यह होता है कि सभी प्रकार का राजनीतिक अधिकार जनता से प्राप्त होता है तथा जनता दूसरों के द्वारा नहीं, बल्कि अपने द्वारा निर्धारित लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए लोगों के सार्वजनिक तथा निजी जीवन को नियंत्रित करने तथा दिशानिर्देश देने में समर्थ है।
स्वंतत्र समाज व्यवस्था के दोनों सिद्धांत एक-दूसरे से जुड़े हैं। इन्हें अलग नहीं किया जा सकता। एक बार यदि पहले को स्वीकार कर लिया जाए, जो दूसरा सिद्धांत स्वतः ही आ जाता है। यदि एक बार मानव-व्यक्तित्व की पवित्रता को स्वीकार कर लिया जाए तो व्यक्तित्व के विकास के लिए उचित वातावरण के रूप में स्वतंत्रता, समानता तथा भाईचारे की आवश्यकता को भी स्वीकार किया जाना चाहिए।
II
हिंदू-समाज व्यवस्था इन सिद्धांतों को कहां तक मान्यता प्रदान करती है? यह जानकारी होना बहुत आवश्यक है, क्योंकि यह केवल इस बात पर निर्भर करता है कि समाज किस सीमा तक इन सिद्धांतों को मान्यता देता है_ इस कसौटी पर कसकर ही इसे एक स्वतंत्र समाज-व्यवस्था कहा जा सकता है।